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"टेंशन नहीं लेने का" - विनोद कुमार जैन आज की भागम-भाग वाली जिन्दगी में जिससे भी बात करिए वही कहता है कि बहुत टेंशन है भई!!! इष्ट मित्र तथा सभी रिश्तेदार सलाह देते है कि यार तुम टेंशन बहुत लेते हो. उनकी बात सुन कर कभी कभी तो लगने लगता है कि शायद जैसे मै बाज़ार गया था टेंशन लेने. अरे नहीं यार जिन्दगी कि रफ़्तार ही ऐसी हो गयी है कि हर व्यक्ति, चाहे वह किसी भी उम्र का हो, किसी भी शहर मै हो, किसी भी प्रोफेशन मे हो, टेंशन से बच नहीं सकता. यह बिना कहीं गए बैठे - बैठे ही आ जाती है. जितना भी इससे बचने का प्रयास किया जाए यह उतनी ही बढ़ जाती है. मैंने तो महसूस किया है कि बचने के प्रयास मे टेंशन डबल हो जाती है. एक तो टेंशन, दूसरे उससे बचने की टेंशन, हो गयी न डबल टेंशन. फिर क्या किया जाए, कैसे बचा जाए इस महा मुसीबत से. नहीं सूझ रहा न कोई रास्ता. टेंशन से दो - चार होते हुए, लोगों की सलाह मशविरा सुनते हुए जब सारे जतन करके भी मै टेंशन से नहीं बच सका तो मैंने सोचना शुरू किया कि आखिर इंसान कर भी क्या सकता है. पर चैन भी तो नहीं आता मात्र यह सोच कर कि कुछ नहीं किया जा सकता. पल दो पल तो काटे जा सकते हैं पर जब सर्दी की रात मे गर्म बिस्तर पर अचानक दिमाग मे कुछ टेंशन आ जाती है तो रात गुजारनी कितनी मुश्किल हो जाती है शायद बताने की जरूरत नहीं है. सभी को अनुभव होगा ही.
सोचते - सोचते अचानक एक दिन मुझे लगा कि यदि टेंशन से बचना वास्तव मे इतना मुश्किल है तो क्यों न हम इसे स्वीकार कर लें, इससे बचने का प्रयास बंद कर दें. यह विचार आते ही मुझे राहत सी महसूस होने लगी. विशेष तौर पर टेंशन से पीछा छुडाने की टेंशन तो तुरंत ही कम हो गयी. बस अब मुझे एक मिशन मिल गया कि जैसे ही कोई टेंशन आती मैं तुरंत ही उसको स्वीकार करने के लिए अपने आप को तैयार करने लगता. शुरू - शुरू मे तो बहुत मुश्किल लगा पर कुछ दिन के अभ्यास से मुझे इसमें आनंद आने लगा. परन्तु अब इसका दूसरा अध्याय मेरे दिमाग मे आने लगा कि टेंशन के साथ खुश कैसे रहा जाए. परन्तु अब मेरा दृष्टिकोण पोजिटिव हो गया था. इस की दूसरी कड़ी पर विचार मंथन शुरू हो गया और पहले की ही तरह एक दिन मुझे जैसे एक बहुत बड़ा सूत्र हाथ लग गया. जानना चाहेंगे क्या था वह सूत्र.....
इसके साथ खुश रहने के लिए बस इतना और सोचना होगा कि ठीक है जो हुआ उसे बदला तो नहीं जा सकता, अब ज्यादा से ज्यादा क्या होगा. जो भी अनुमान लगे बस उसके लिए अपने आप को तैयार करना पड़ेगा. सच शुरू मे बहुत दुरूह कार्य लगता था पर अब तो जैसे यह साधना सी हो गयी है और इसमें अधिक कठिनाई नहीं होती. इस पर सोने पे सुहागा श्रीमद भागवदगीता के एक श्लोक ने कर डाला "ईश्वर्यीअम करोति शोभनम करोति" "Ishvareeyam karoti shobhnam karoti" अर्थात ईश्वर जो भी करता है अच्छा ही करता है. एक और हकीकत है कि जो घट चुका वह इतिहास हो गया और उसे बदला नहीं जा सकता उससे सिर्फ कुछ सबक लिया जा सकता है. तो फिर "टेंशन नहीं लेने का...." परिचय - श्री विनोद कुमार जैन देश से, समाज से, सहारनपुर से और हिन्दी से अनन्य प्रेम रखने वाले बैंक अधिकारी हैं जो आजकल बैंक ऑफ इंडिया, आंचलिक कार्यालय, नॉएडा में मुख्य प्रबंधक के नाते कार्यरत हैं। आपकी विद्वता, कर्मशीलता, बैंक के प्रति समर्पण की भावना का कायल आपका बैंक भी है और यही कारण है कि बहुत कम समय में बहुत तेजी से आप प्रोन्नति के एक के बाद एक सोपान चढ़ते चढ़ते लिपिक संवर्ग से आरंभ करके आज स्केल IV के बैंक अधिकारी हैं और इससे भी अगले स्केल V पर जाने के लिये प्रयासरत हैं। लेखन में विनोद जैन की रुचि प्रारंभ से ही रही है। पर, उनके अपने शब्दों में, यह उनका प्रथम प्रयास है। चलिये, ऐसा ही सही !
संपर्क सूत्र : बैंक ऑफ इंडिया, आंचलिक कार्यालय, नॉएडा,
गौ.बु.नगर
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