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जिस मुसलमान को वन्दे मातरम्‌ गाना होगा- वह गायेगा - फतवा चाहे हो या न हो !

इस्लामिक नेताओं द्वारा वन्दे मातरम्‌ के विरोध के विरोध में अनेकों स्तर पर क्षोभ व रोष का प्रदर्शन हुआ है। दारुल उलूम देवबन्द द्वारा वन्देमातरम्‌ गायन हेतु मुसलमानों को अनुमति दे दिये जाने के समाचार से देश वासियों ने राहत की सांस ली ही थी कि अगले ही दिन दारुल उलूम के वन्दे मातरम्‌ विरोधी बयान फिर आ जाने से यह स्पष्ट हो गया कि कट्टरपंथी ताकतें सिर्फ पाकिस्तान सरकार पर ही हावी नहीं हैं, बल्कि दारुल उलूम देवबन्द भी इनका शिकार है।
 
इतिहास गवाह है कि इस्लामिक भावनाओं का सम्मान करते हुए वन्दे मातरम्‌ को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार करते समय उसमें केवल वे ही दो पद आधिकारिक रूप से स्वीकार किये गये थे जिनमें किसी भी प्रकार से मुस्लिम विरोध की भावना की कोई गुंजाइश नहीं थी। पर अगर विरोध करने के लिये विरोध करना ही लक्ष्य हो तो एक कारण न रहे तो न सही, दूसरा कारण ढूंढ लिया जायेगा। यही वन्दे मातरम्‌ के साथ हो रहा है। वन्दे मातरम्‌ का विरोध करने वाले कतिपय मुस्लिम मजहबी नेता व राजनीतिज्ञ सिर्फ अखबारों व टी.वी. चैनल पर अपने नाम और चेहरे देखने के लालच में ऐसे अतिवादी बयान और फतवे दिया करते हैं और यह आभास देते हैं कि उनके फतवों का उनके अनुयायी आदर-सम्मान करते हैं। जब कि सच यह है कि इस्लामिक मजहबी नेताओं को राजनीतिज्ञ लोग तो सिर्फ इस लिये लिफ्ट देते हैं कि शायद उनके समर्थन और सहयोग से कुछ मुस्लिम वोट पक्के हो जायेंगे। मीडिया इस लिये उनकी बातों को लेकर सुर्खियां बनाता है कि इससे सनसनी पैदा होगी और अखबार बिकेगा, टी.आर.पी. रेटिंग ऊंची जायेगी । पर जहां तक आम मुसलमान का सवाल है, अब उसकी मानसिकता बदल गई है। वह देख रहा है कि समर्थ को कोई दोष नहीं लगता। सानिया मिर्ज़ा द्वारा टेनिस खेलते हुए जो मिनी स्कर्ट पहनी जाती है उसका विरोध किया गया पर जब सानिया ने एक नहीं सुनी तो चुप होकर बैठ गये। भारत के दुलारे संगीतकार ए. आर. रहमान ने वन्दे मातरम्‌ गीत का न केवल शानदार संगीत तैयार किया, अपितु इस अत्यन्त लोकप्रिय गीत को अपनी मधुर आवाज़ भी दी। ए.आर. रहमान का इन फतवा - विशेषज्ञों ने क्या बिगाड़ लिया ? ए.आर. रहमान से पहले भी मुहम्मद रफी जैसे महान गायक हुए जिनके गाये भजन आज तक कानों में गूंजते रहते हैं। न जाने कितने मुस्लिम अभिनेता - अभिनेत्रियां हैं जिन्होंने हिन्दू किरदार निभाते हुए हर वह रस्म अदा की, जो इन फतवा विशेषज्ञों की निगाह में कुफ्र गी। मीना कुमारी और वहीदा रहमान जैसी अदाकाराओं ने सिंदूर भी लगाया, बिछुए, कंगन, मंगलसूत्र भी पहने और मंदिरों में देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना भी की। किसने उनका क्या बिगाड़ लिया ?

सच तो यह है कि अपने अनुयायियों को भेड़- बकरियों की तरह हांकने की इन फतवेदारों की मनोवृत्ति को उनके खुद के अनुयायी पहचान रहे हैं। गणित और विज्ञान की शिक्षा का विरोध करके इन मजहबी नेताओं ने स्वयं ही बता दिया है कि वह किस अंधे कुएं में बैठे हैं और बाहर निकलने को राजी नहीं हैं। इन मजहबी और राजनीतिक नेताओं के पीछे चलते चलते मुसलमान प्रगति की दौड़ में पिछड़ता चला गया है क्योंकि इन नेताओं की दिलचस्पी वास्तव में केवल अपनी दुकान चलाने में है। और यह दुकान तब तक ही चलती है जब तक ऐसा आभास बना रहे कि आम मुसलमान उनकी बात सुनता और मानता है।

प्राचीन भारत में ऋषि मुनि कभी कभी नाराज़ होकर श्राप दे दिया करते थे। बात बात पर नाराज़ होने वालों में दुर्वासा ऋषि का नाम सबसे प्रमुख है। यह श्राप भी एक प्रकार का फतवा ही था जो ऋषि-मुनियों की नैतिक सत्ता के कारण प्रभावी होता था। राजा-महाराजा और न्यायपालिका इस श्राप को लागू करने में उनकी मदद किया करते थे। गौतम ऋषि ने अपनी पत्नी अहिल्या का परित्याग किया तो किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि गौतम ऋषि के आदेश का विरोध कर सके। पर दशरथ पुत्र राम ने गौतम ऋषि के श्राप की रत्ती भर परवाह न करते हुए मां अहिल्या के न केवल दर्शन किये बल्कि उनके पुनर्वास का भी दायित्व उठाया। यह एक नैतिक सत्ता को दूसरी नैतिक सत्ता द्वारा चुनौती देने का अन्यतम उदाहरण है।

आधुनिक युग में भी देखें तो न्यायालय के फैसले तब तक ही सम्मान्य होते हैं जब तक वह प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त के अनुकूल हों, देश व समाज के हित साधक हों। माननीय उच्चतम न्यायालय के अनेकानेक फैसले ऐसे हैं जिनको कांग्रेस सरकार ने कभी भी अहमियत नहीं दी, उनको लागू कराने की कभी कोई चेष्टा नहीं की गई क्योंकि विधायिका का दृष्टिकोण न्यायपालिका के दृष्टिकोण से जुदा था। कई बार इन फैसलों को नकारने के लिये कानून में ही परिवर्तन कर दिया गया और कई बार सिर्फ अनसुना कर दिया गया। ऐसे में न्याय पालिका ने भी अपने फैसलों के सम्मान की रक्षार्थ "सुझाव" शब्द का उपयोग करना आरंभ कर दिया।

वास्तविकता के धरातल पर तो ऐसा पहले ही हो चुका है कि फतवे एक सुझाव से अधिक महत्व के नहीं रह गये हैं। फतवों का कितना महत्व होगा, यह सीधे-सीधे इस बात पर निर्भर करता है कि वह फतवा एक आम समझदार नागरिक की बुद्धि में फिट बैठता है या नहीं। यदि कोई मजहबी नेता मुसलमानों को यह आज्ञा दे कि गणित और विज्ञान पढ़ाना बन्द करो, डायनिंग टेबिल पर बैठ कर खाना मत खाओ, टीवी मत देखो, मोबाइल मत प्रयोग करो तो भला ऐसे फतवों का क्या हश्र होगा ? यदि एक आम मुसलमान को लगता है कि ए.आर. रहमान ने वन्दे मातरम्‌ गाया और जन-जन का खूब प्यार और सम्मान अर्जित किया तो मुसलमान भी वन्दे मातरम्‌ गाने से क्यों परहेज़ करेंगे? जिसका मन चाहेगा, वन्दे मातरम्‌ गायेगा, खूब गायेगा, डंके की चोट पर गायेगा - वन्दे मातरम्‌ गाने वाले किसी भी मुसलमान का कम से कम भारत में तो ये फतवा विशेषज्ञ कुछ बिगाड़ नहीं पायेंगे।

वन्दे मातरम्‌ : आखिर इसमें खराबी क्या है?

वन्दे मातरम्‌ गीत १८७२ में लिखा गया था और १८९६ में पहली बार इसे कांग्रेस के अधिवेशन में गाया गया था। मराठी, कन्नड़, गुजराती, तमिल, हिन्दी व मलयाली आदि अनेकानेक भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ। महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसे स्वरबद्ध किया व कांग्रेस के अधिवेशन के उद्‌घाटन सत्र में स्वयं गाया । अप्रैल १९०६ में बंगाल प्रांत के अधिवेशन में जिसमें एक मुस्लिम नेता अध्यक्षता कर रहे थे, इस गीत को गाया गया। तथापि, मुस्लिम समाज का एक छोटा सा परन्तु राजनीतिक रूप से सक्रिय हिस्सा इस राष्ट्रगीत के कुछ अंशों को ’मुस्लिम भावनाओं को आहत करने वाला’ मानता चला आ रहा है। अतः उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए इस गीत का संक्षिप्त स्वरूप राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया गया। इस संक्षिप्त संस्करण में केवल पहले दो पद ही शामिल किये गये जिसमें भारत मातृभूमि की विशेषताओं को याद करते हुए नमन किया गया है। परन्तु अब यह आपत्ति उठाई जाने लगी है कि इस्लाम में केवल खुदा को ही सिजदा किया जा सकता है और चूंकि वन्दे मातरम्‌ गीत में मातृभूमि की प्रशंसा करने हुए उसका नमन किया गया है इसलिये यह इस्लाम विरोधी है।  

वास्तव में, अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद के विरुद्ध भारत द्वारा जो स्वतंत्रता आंदोलन छेड़ा गया, उसमें वन्दे मातरम्‌ सबसे प्रमुख उद्‌घोष रहा। इस स्वतंत्रता आंदोलन को कमजोर करने के लिये अंग्रेज़ों द्वारा जो कूटनीति अपनाई गई, उसमें एक यह भी रही कि हिन्दू व मुसलमानों के बीच में खाई खोदी जायें।  मुस्लिमों को भड़काने के प्रयास में, अंग्रेज़ों की "फूट डालो और राज्य करो" नीति का अनुपालन करते हुए १९३७ में सर हैनरी क्रीक ने गवर्नर पॉवेल को लिखा था कि यह गीत मुस्लिमों के प्रति घृणा का प्रदर्शन करता है। अगले ही वर्ष १९३८ में जिन्ना ने मुस्लिम लीग के अधिवेशन में कांग्रेस पर यह आरोप लगाया कि कांग्रेस वन्देमातरम्‌ गीत को मुस्लिमों पर थोपने की कुचेष्टा कर रही है। समय-समय पर वन्देमातरम्‌ विरोधी स्वर यदा कदा उठते रहे। सनसनीखेज सुर्खियों के लिये हमेशा व्याकुल रहने वाला भारत का मीडिया भी इन कतिपय राष्ट्रगीत विरोधी मुस्लिम नेताओं को ही महत्व देते हुए, उनके वक्तव्यों को अपने समाचार पत्रों में विशेष महत्व के साथ प्रकाशित किया करता है।

बहुत सारे लोगों को यह जानकारी नहीं होगी कि वन्देमातरम्‌ गीत को लेकर मुस्लिम लीग ने और जिन्ना ने कांग्रेस पर जो लांछन लगाये उसे लेकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और नेहरू बहुत विचलित और दुःखी थे।
   
१ जुलाई १९३९ को हरिजन पत्र में लिखे अपने लेख में गांधी जी ने लिखा - "इस गीत (वन्देमातरम्‌) का स्रोत कुछ भी रहा हो, यह कभी भी, किन्हीं भी परिस्थितियों में रचा गया हो, बंगाल विभाजन के काल-खंड में हिन्दुओं और मुसलमानों के लिये यह गीत अंग्रेज़ों के विरुद्ध युद्ध का सबसे महत्वपूर्ण उद्‍घोष था। यह साम्राज्यवाद के विरुद्ध युद्ध की ललकार बना रहा । जब मैं छोटा बच्चा ही था और न तो आनंदमठ और न ही इस गीत के अमर रचयिता बंकिम को जानता था, वन्देमातरम्‌ गीत ने मुझे झकझोर दिया था और जब मैने इसे गाया जाते हुए सुना तो मैं आनंदविभोर हो गया था। मुझे यह राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत गीत लगा। मुझे कभी ऐसा स्वप्न में भी ख्याल नहीं आया कि यह गीत केवल हिन्दुओं का और हिन्दुओं के लिये लिखा गया गीत है। परन्तु आजकल बुरा दौर आ गया लगता है। जो कभी खरा सोना हुआ करता था, आजकल पीतल माना जा रहा है। ऐसे में समझदारी इसी में लगती है कि सोने को सोना कह कर बेचने का यत्न न किया जाये और इसे पीतल ही मान लिया जाये। मैं वन्दे मातरम्‌ गीत के किसी मिश्रित समूह में गायन को लेकर झगड़े नहीं चाहता। गाया न जाने से वन्देमातरम्‌ गीत का कुछ नुकसान होने वाला नहीं है। यह गीत करोड़ों हृदयों पर राज्य करता रहा है और करता रहेगा। यह बंगाल में और बंगाल के बाहर भी लाखों लोगों के हृदय में राष्ट्र के प्रति प्रेम की भावना का संचार करता है। इसके चयनित किये गये पद बंगाल की हमारे देश को अनुपम भेंट हैं।"

२५ अगस्त १९४८ को प्रथम प्रधानमंत्री व कांग्रेस के नेता पं. जवाहर लाल नेहरू ने संसद में अपने वक्तव्य में कहा,
"यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि वन्देमातरम्‌ और जन-गण-मन के बीच में कुछ विवाद खड़ा किया जा रहा है। यह पूर्णतः स्पष्ट व विवाद से परे है कि वन्दे मातरम्‌ गीत भारत का सर्वोत्तम राष्ट्रीय गीत है जिसका ऐतिहासिक महत्व है। यह हमारे स्वतंत्रता आंदोलन से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। इसका यह महत्व कम नहीं किया जा सकता और कोई भी अन्य गीत इसका स्थान नहीं ले सकता। यह हमारे स्वातंत्र्य आंदोलन की भावनाओं व जनचेतना की अभिव्यक्ति है पर शायद इसके अन्त का नहीं।"

जन-गण-मन गीत को राष्ट्रगान के रूप में कैसे चुन लिया गया इस पर प्रकाश डालते हुए पं. नेहरू ने संसद को बताया था कि "१९४७ में न्यूयॉर्क, अमेरिका में राष्ट्रसंघ के अधिवेशन में भारतीय प्रतिनिधि मंडल से एक विशेष अवसर पर गाने के लिये राष्ट्रगीत मांगा गया था। प्रतिनिधि मंडल के पास जन-गण-मन गीत का एक रिकॉर्ड उपलब्ध था जो उन्होंने ऑर्केस्ट्रा को तैयार करने के लिये दे दिया। जब यह गीत ऑरकेस्ट्रा ने सुनाया तो इसकी धुन बहुत ही आकर्षक मानी गई। बहुत सारे देशों के प्रतिनिधियों ने हमारे प्रतिनिधि मंडल से इस धुन की मांग की और इस प्रकार जन-गण-मन गीत ही भारत के राष्ट्रगान के रूप में अनेको देशों में प्रचलित हो गया।
- सुशान्त सिंहल
 

 

 
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