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सहारनपुर : काश कुछ ऐसा
हो (Saharanpur - Vision for a Better Future)
क्या कोई
शाकुंभरी तीर्थ का जीर्णोद्धार नहीं कर सकता ?
जो श्रद्धालु जन
आज से लगभग बीस वर्ष पूर्व माँ वैष्णों देवी के दर्शन करने गये होंगे
और आज दोबारा जायें तो वह सहसा अपनी आँखों पर विश्वास नहीं कर पायेंगे
कि हर प्रकार की सुविधा से विहीन, दुर्गम पहाड़ियों में बसा हुआ ये
तीर्थ स्थल अचानक इतना सुन्दर और सुख सुविधा सम्पन्न कैसे हो गया! पहले
हालात ये थे कि तीर्थयात्री कटरा से मां के दरबार तक की कठिन चढ़ाई
अत्यन्त कष्टकर ढंग से पूर्ण कर पाते थे क्योंकि रास्ते भर न तो एक
बूंद पानी मिलता था और न ही पल भर विश्राम करने/सुस्ताने के लिये कोई
बैंच ही थी। यदि किसी महिला के गोद के बच्चे ने टट्टी कर ली तो धोने के
लिये एक बूंद पानी भी नहीं होता था। छः रुपये वाली कोल्ड ड्रिंक की
बोतल दस रुपये में खरीद कर उससे बच्चे के शरीर को साफ करना पड़ता था।
सारे दुकानदार लूट खसोट मचाये रहते थे। गंदगी इस कदर कि नाक पर कस कर
कपड़ा बांध कर, दिल मज़बूत करके मूत्रालय / शौचालय में घुसना पड़ता था।
अन्दर जाकर साक्षात नर्क के दर्शन हो जाते थे।
फिर एक दिन जम्मू काश्मीर की सरकार ने निर्णय किया कि इस तीर्थस्थल का
अधिग्रहण किया जाये। भाजपा समेत अनेक हिन्दू संगठनों ने हल्ला मचाया कि
ये हिन्दू विरोधी सरकार हिन्दू तीर्थों पर कब्ज़ा करना चाहती है। उन
दिनों जम्मू काश्मीर के गवर्नर जगमोहन थे। अधिग्रहण के बाद ये तीर्थ
उनके नियन्त्रण में आ गया और फिर आरम्भ हुआ इसका काया पलट अभियान। अब
वह क्या है येह अपनी आँखों से देख कर ही विश्वास किया जा सकता है। बरबस
मुँह से निकल पड़ता है - यदि अधिग्रहण कर लेने से ऐसा चमत्कार हो जाता
है तो सरकार को सारे तीर्थों का अधिग्रहण आज ही कर लेना चाहिये। बस
शर्त एक ही है - ये सभी तीर्थ जगमोहन जैसे कर्मठ एवं कर्तव्यपरायण
राज्यपाल के हाथ में जाने चाहियें।
हर प्रकार की सुविधओं से वंचित ऐसा ही एक तीर्थ माँ शाकुम्भरी देवी का
दरबार भी है। सहारनपुर के मुख्य आकर्षणों में से एक ये तीर्थस्थल, नगर
से ४२ किलोमीटर उत्तर की ओर शिवालिक की सुरम्य वादियों में स्थित है।
देश विदेश में मौजूद लाखों करोड़ों हिन्दुओं की आस्था उनको यहां बरबस
खींच लाती है। उल्लेखनीय है कि जिस भूमि पर ये तीर्थ स्थित है, वह
भूतपूर्व जसमौर रियासत के अन्तर्गत आती है अतः इसका भूस्वामित्व रानी
देवलता नाम की एक महिला के पास है जो राणा परिवार की वर्तमान मुखिया
हैं। ये महिला भाजपा से जुड़ी हुई हैं। ये भी कहा जा सकता है कि ये
भाजपा से जुड़ी ही इस लिये हैं ताकि चढ़ावे के रूप में प्राप्त होने वाली
करोड़ों रुपये की आय कहीं हाथ से न निकल जाये। हिन्दू हितों की रक्षा का
दम भरने वाली भाजपा, रानी देवलता को अपना विधान सभा का प्रत्याशी बना
कर हिन्दू तीर्थयात्रियों के नहीं बल्कि रानी देवलता के हित साधने में
लीन रहती है। जब भी इस क्षेत्र में कुछ ढांचागत सुविधाओं के निर्माण की
बात होती है, विस्तार का प्रस्ताव आता है, राणा परिवार को लगने लगता है
कि उनके विरुद्ध षड्यन्त्र हो रहा है और कहीं ये दुधारु गाय सा
तीर्थस्थल हाथ से न निकल जाये। बस, राणा परिवार के विरोध के चलते सारे
प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चले जाते हैं। हर वर्ष बरसाती नदी में अचानक आ
जाने वाले पानी में कई तीर्थयात्री बह जाते हैं। पानी का बहाव इतना
तीव्र होता है कि उसमें कार और बस का भी संभलना कठिन हो जाता है। भूरा
देव मंदिर से लेकर माँ शाकुंभरी देवी के दरबार तक लगभग एक किलोमीटर नदी
में पत्थरों पर चलना होता है तब हम दरबार तक पहुंचते हैं। इस मार्ग पर
यदि पुल / फ्लाई ओवर बन जाये तो सभी यात्री सुरक्षित रूप से मन्दिर तक
पहुंच सकते हैं।
रानी देवलता व राणा परिवार के पास इतनी आर्थिक सम्पदा बताई जाती है कि
वह अकेले अपने दम पर इस फ्लाईओवर का निर्माण कार्य अपने हाथ में ले
सकते हैं। इतना खर्च करने की क्षमता न भी हो, पर कुछ आर्थिक सहयोग करने
की क्षमता तो होगी ही। यदि वह ऐसा करें तो इस भू क्षेत्र की ही नहीं,
सभी आस्थावान हिन्दुओं के दिलों की भी रानी बन सकती हैं। पर बताया यही
जाता है कि इस क्षेत्र के विकास की हर बात में उनको अपनी सम्पत्ति पर
सरकारी कब्ज़ा होने का भय सताता रहता है। दरबार में दीवार पर एक नोटिस
बोर्ड टंगा हुआ है जिस पर लिखा है कि यहां दिया गया दान इस तीर्थ के
विकास में व यात्रियों की सुविधाओं के लिये खर्च किया जायेगा। पर इस मद
में एक पैसा भी खर्च होता दिखाई नहीं देता है। न तो तीर्थ का विकास ही
हो रहा है और न ही यात्रियों की सुविधा के लिये कुछ किया जाता दिखाई
देता है। क्या यह जनता के विश्वास को ठगना नहीं है? क्या जनता द्वारा
दिये जा रहे दान को अपनी जेब में डाल लेना भिक्षा पर गुज़ारा करने के
समकक्ष नहीं है? क्या राणा परिवार अब इतनी दुरवस्था में है कि भीख पर
गुज़ारा करने के लिये विवश है?
रानी देवलता से रार मोल लेने की क्षमता केवल एक राजनीतिज्ञ में है और
वह हैं उत्तर प्रदेश की वर्तमान मुख्यमन्त्री मायावती। यदि वह ठान लें
कि इस पावन तीर्थस्थल का उद्धार करना है और देश विदेश से आने वाले
तीर्थयात्रियों को समुचित सुविधायें प्रदान करानी हैं तो जनता का अपार
सहयोग और समर्थन उनको सहज ही मिलेगा। यदि वह एक फ्लाईओवर का निर्माण
करा पाती हैं और इस पावन तीर्थस्थल का समुचित विकास करा पाती हैं तो इस
तीर्थ के व देश के इतिहास में मुख्यमन्त्री मायावती का नाम
स्वर्णाक्षरों में लिखा जायेगा।
क्या बहिन मायावती सुन रही हैं? |
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सहारनपुर में स्कूल बसें भी सुरक्षित नहीं।
सहारनपुर की सबसे बड़ी समस्या की ओर
इंगित करना हो तो कहना होगा कि विभिन्न सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार
जनित अकर्मण्यता हमारे नगर की सबसे बड़ी समस्या है फिर चाहे वह संभागीय
परिवहन विभाग हो या पुलिस विभाग । शायद हमारे अधिकारियों का यह मानना
है कि नियमित रूप से सुविधा शुल्क मिलता रहे तो दुनिया का कोई भी अपराध
ऐसा नहीं है जिसे अनदेखा न किया जा सके।
परिवहन विभाग को ही लें। इस विभाग के अधिकारी दलालों के शिकंजे में इस
कदर जकड़े हुए हैं कि आपकी गाड़ी यदि खंडहर हो चुकी हो तो भी फिटनेस मिल
जायेगी, आपके खानदान में भी किसी को दूर - दूर तक ड्राइविंग न आती हो,
आपकी एक आंख फूटी हुई हो तो भी आपको वाहन चालक के नाते लाइसेंस घर बैठे
- बैठे मिल सकता है। यदि आपकी जेब में पैसे हैं तो आप अपने बच्चे की
प्रथम वर्षगांठ पर उसे ड्राइविंग लाइसेंस का उपहार (या श्राप ? ) दे
सकते हैं।
और पुलिस विभाग ? पुलिस विभाग की तो जितनी प्रशंसा की जाये, कम ही है।
अपराधियों के प्रति इतना सहयोग पूर्ण रुख किसी अन्य स्थान पर दुर्लभ ही
होगा। चौराहे पर लकड़ी या बजरी से ऊपर तक लदी हुई ट्रेक्टर ट्रॉली पहुंचे
तो ड्राइवर अपनी हथेली में पहले से ही पचास रुपये का नोट तैयार रखता
है। चौराहे पर तैनात पुलिस कर्मी भी जिस सफाई से हथेली से हथेली मिलाता
है, वह देखते ही बनती है। सहारनपुर के वाहन चालक ट्रैफिक जाम लगाने में
महारत हासिल रखते हैं। जब तक पूरी तरह से सारे वाहन चौराहे पर एक दूसरे
में उलझ न जायें, पुलिस कर्मी आस-पास नज़र भी नहीं आते। जब स्थिति
विकराल रूप धारण कर ले तब पान या गुटका चबाता हुआ, डंडा हाथ में लिये
हुए, मरियल सा एक पुलिस कर्मी चौराहे पर पहुंचता है और यह समझ ही नहीं
पाता कि अब इस जाम से कैसे निबटा जाये। दो-चार डंडे इधर-उधर फटकारता
है, रिक्शा वालों के रिक्शा पर डंडा बजाता है भले ही जाम ट्रक, कार और
मोटर साइकिल वालों की वज़ह से लगा हुआ हो और फिर सबको भगवान भरोसे छोड़
कर वहां से सरक लेता है।
ऐसे में क्या यह आश्चर्य की बात है कि स्कूल बस में बैठ कर स्कूल जाने
वाले बच्चे भी सहारनपुर में सुरक्षित नहीं हैं और जब-तब दुर्घटनाओं के
शिकार बनते रहते हैं? रिक्शे पर अनगिनत बच्चे ले जाने वाले रिक्शा चालक
हमेशा से बच्चों की सुरक्षा के लिये खतरा माने जाते रहे हैं। अभिभावक
इन रिक्शों से बजाय स्कूल बस में अपने बच्चों को भेज कर भी बच्चों की
सुरक्षा के प्रति निश्चिंत नहीं हो पा रहे हैं तो इसमें सबसे बड़ा दोषी
परिवहन विभाग और पुलिस विभाग ही है। ड्राइवरों को वाहन चलाते समय
मोबाइल फोन पर बतियाते अक्सर देखा जा सकता है। स्कूटर मोटर साइकिल पर
भी गरदन तिरछी कर के फोन फंसा लिया जाता है और वाहन और बातचीत दोनों
चलते रहते हैं। मियां जी स्कूटर चलाते हैं और पिछली सीट पर बैठी उनकी
अर्धांगिनी मोबाइल उनके कान पर सटाये रखती है और कई - कई किलोमीटर तक
बातचीत चलती चली जाती है। समय-प्रबंधन की कला इसी को कहते हैं शायद !
सहारनपुर में अभी २२ अक्तूबर को स्कूल बस के पलटने की दर्दनाक घटना
घटित हुई जिसमें एक छात्रा की मौत हुई और १५ से अधिक बच्चे घायल हुए
हैं। इस घटना में वाहन-चालक तो दोषी है ही, पर परिवहन विभाग और पुलिस
विभाग भी बराबर के दोषी हैं। यदि ओवरटेक कर रहे बस ड्राइवर के एक हाथ
में स्टीयरिंग और दूसरे में मोबाइल भी रहा हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं
होगी। स्कूल बस में बैठे हुए बच्चे और अध्यापक - अध्यापिकायें "भैया
जी, जल्दी करो, जल्दी करो, देर हो गई है!" कह - कह कर बस ड्राइवर पर
दबाब डालते हैं कि वह शीघ्र से शीघ्र स्कूल पहुंचा दे। ऐसे में
दुर्घटनाएं अवश्यंभावी हैं।
जहां तक स्कूल बसों के सुरक्षित संचालन का संबंध है, हर स्तर पर सुधार
की जरूरत है। परिवहन विभाग के अधिकारी तो भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए
हैं ही जो खटारा बसों को फिटनेस प्रमाणपत्र देते हैं और उनकी अंतरात्मा
उनको एक बार भी नहीं कचोटती । इस खटारा बस का लापरवाह ड्राइवर कितने
खतरनाक ढंग से बस चला रहा है इसको लेकर ट्रेफिक पुलिस भी कतई चिंतित नहीं
होती। अक्सर बस ड्राइवर वाहन चलाते समय मोबाइल पर बात करते रहते हैं या
फिर बोनट पर बैठे हुए अपने सहायक से गप-शप मारते रहते हैं। बस में बैठी
हुई अध्यापिकाओं और बच्चों को भी स्कूल पहुंचने की जल्दी होती है ताकि
सजा न मिले। यदि कोई बस को सुरक्षित ढंग से चलाने के लिये ड्राइवर को
समझाने का प्रयास करें तो न तो ड्राइवर उनकी सुनते हैं और न ही स्कूल
के प्रबंधकों के कानों पर जूं रेंगती है। स्कूल प्रबंधक बच्चों को यह
सुविधा देने के नाम पर भी कमाई करना चाहते हैं। सस्ते से सस्ता सौदा
पटाने के लिये यदि खटारा बस का भी अनुबंध करना पड़े तो उनको इसमें कोई
शर्म नहीं है जबकि अभिभावकों की जेब पर पूरी निर्दयता से चाकू चलाया
जाता है। ड्राइवर और क्लीनर के द्वारा बीड़ी-सिगरेट-गुटका के प्रयोग पर
भी किसी को कोई आपत्ति नहीं है। और अंत में, यदि कोई दुर्घटना हो जाती
है तो जिला-प्रशासन कुछ दिनों के लिये हरकत में आता है, कुछ अभियान छेड़े
जाते हैं पर कुछ ही दिनों बात हालत वहीं की वहीं । दोषियों को सजा
दिलाने के लिये भी हमारे देश में कई दशकों तक इंतज़ार करना होता है।
ऐसे में इस समस्या से कैसे निजात पाई जाये, इस बारे में आप सब क्या
सोचते हैं ? |
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