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मंडलायुक्त : श्री आर.
पी. शुक्ल - एक अनुकरणीय व्यक्तित्व
श्री आर. पी. शुक्ल जैसे बहु-आयामी, विराट् व्यक्तित्व का
संपूर्ण परिचय देने के लिये एक पृष्ठ नहीं, एक पूरी वेबसाइट की आवश्यकता होगी।
मुझे नहीं मालूम कि अभी कोई ऐसी वेबसाइट बनी है अथवा नहीं। यहां इस पृष्ठ पर
श्री शुक्ल के विषय में केवल इतना ही कहा जा सकता है - " न भूतो न भविष्यति"
। कुशल, कर्तव्यपरायण प्रशासनिक अधिकारी तो वह हैं ही, साथ ही एक
ओजस्वी वक्ता, विचारशील लेखक, भावुक कवि, कुशल मूर्तिकार और चित्रकार
भी हैं। यदि इतना पर्याप्त न हो तो वह एक जादूगर भी हैं और यदि
मूड बन जाये तो दो घंटे का जादूगरी का शो तो दे ही सकते हैं। मानवीय संवेदनाओं की बात करें तो पुष्प से भी कोमल और समाज
में मौजूद अनचाहे उग आई खरपतवार को उखाड़ फेंकने की जरूरत हो तो वज्र से भी कठोर ।
विधा कोई भी हो, श्री शुक्ल उसका उपयोग करते हैं - समाज को बेहतर बनाने के
लिये, युवाओं को प्रेरित करने के लिये, कुछ नया और बेहतर करने को उत्साहित करने के लिये।
आप सिर्फ भाषण नहीं देते, सरकारी फाइलों पर टिप्पणियां ही नहीं देते, खुद आगे
बढ़ कर कर्म क्षेत्र में कूद पड़ते हैं - अनुकरण करने योग्य उदाहरण प्रस्तुत करते
हैं।
मुझे यदि चिन्ता है तो केवल यह कि भगवान ने बहुत सारे आर.पी. शुक्ल नहीं बनाये हैं
और खुद श्री आर. पी. शुक्ल सर्वव्यापी हो नहीं सकते। आज श्री शुक्ल को
अपने बीच पाकर हम सब उत्साहित हैं कि वह सहारनपुर के लिये बहुत कुछ कर रहे हैं पर
कल जब वह सेवा निवृत्त हो जायेंगे, उसके बाद ? क्या वह अपने
आधीन कार्य कर रहे सरकारी अधिकारियों में भी वैसी ही कार्य संस्कृति विकसित कर पा
रहे हैं जो कार्य शैली अब उनकी विशिष्ट पहचान बन गई है? कल जब वह
सहारनपुर से चले जायेंगे तो क्या सुखद परिवर्तन की जो हवा आज सहारनपुर में
बह रही है - वह यूं ही बहती रहेगी या थम जायेगी? श्री शुक्ल का
व्यक्तित्व इतना विराट् है कि बाकी अधिकारियों के लिये यह सोच लेना बड़ा ही सरल है
कि भई, वह तो बहुत विलक्षण व्यक्तित्व थे, हम तो साधारण
लोग हैं - हम उनके जैसे नहीं हो सकते। हमसे आर.पी. शुक्ल जैसा होने की अपेक्षा न ही
की जाये। आज श्री शुक्ल जिस सड़क पर निकल जायें,
अतिक्रमण करने वालों में हाहाकार मच जाता है, पर सड़क से उनका बुलडोज़र का
काफिला गुज़र जाने के बाद सब कुछ पहले जैसा ही होना चाहता है। श्री
शुक्ल की सफलता तो इसमें है कि अतिक्रमण करने वालों को हर प्रशासनिक अधिकारी में आर.
पी. शुक्ल की छवि दिखाई देने लगे। मंडल व जिले का हर प्रशासनिक अधिकारी यदि
इसी कार्य संस्कृति में एकाकार हो जाये तभी यह सुखद परिवर्तन स्थाई स्वरूप ले सकेंगे।
अभी तो दूर-दूर तक ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा। क्या सचमुच ऐसा हो
पायेगा ? काश ऐसा हो, अवश्य हो।
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श्री आर. पी. शुक्ल का संक्षिप्त परिचय
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जन्म |
15 अगस्त 1949 ग्राम हाजीपुर-गंग, जिला फतेहपुर,
उ.प्र. |
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माता-पिता |
स्व. श्रीमती सावित्री देवी व श्री के. पी.
शुक्ल |
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स्थाई पता |
9, निर्माण भवन, 401 चतुर्थ तल, निकट जोशी
क्लासेज़, प्राग नारायण स्ट्रीट, लखनऊ । |
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शिक्षा |
एम. ए. (दर्शनशास्त्र),
एल एल. बी., "Gandhi's Interpretation of Hinduism" विषय पर शोध
कार्य लंबित |
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अभिरुचि |
साहित्य
सृजन, वक्तृता, बास्केट बॉल, शूटिंग, नृत्य, गायन,
जादूगरी, मूर्ति-शिल्प, चित्रकारिता । गरीब, असहाय की आंखों के
आंसू पोंछना, प्रतिभा को प्रोत्साहित करते रहना विशेष रूप से
प्रिय है। नई नई विधाओं को सीख कर उनमें दक्षता प्राप्त करना भी
बहुत अच्छा लगता है। |
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खेलकूद |
बास्केट बॉल में उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व करते रहे।
1979 में स्टेट राइफल शूटिंग में खिताब हासिल किया। |
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लेखन |
गीत-गज़ल के कैसेट्स व सी.डी. बाज़ार में हैं।
उनके लिखे गीतों को प्रख्यात गायिका आशा भोंसले तथा अन्य अनेकों
प्रसिद्ध गायकों ने अपनी आवाज़ प्रदान की है। ’संवेदन के
शब्दायाम, बदलते घर, यादों के साये, कुछ भूला कुछ याद रहा
व स्मृति कलश प्रकाशित ग्रंथ हैं। फूल और बबूल
(लघुकथा संग्रह), मेरी अजिया (कहानी संग्रह),
टुकड़ा-टुकड़ा दर्द (उपन्यास) । सहारनपुर के अपने दो वर्ष
के प्रवास के दौरान अपने अनुभवों को मनोरंजक अंदाज़ में
"शुक्रिया सहारनपुर" में उन्होंने
संजोया है।
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पारिवारिक |
धर्म पत्नी - श्रीमती नमिता शुक्ला,
पुत्र श्री अश्वनी शुक्ल, पुत्री कु. प्रियंका शुक्ल,
मानस-पुत्र - उत्कर्ष |
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विशेष |
चाय बेच रहे छोटे बच्चे में विलक्षणता अनुभव करते हुए
उसे दत्तक पुत्र के रूप में अपनाया। गरीब परिवारों की पुत्रियों
के विवाह हेतु स्वयं धर्मपिता बन कर समस्त उत्तरदायित्वों का निर्वाह
किया। डा. वीरेन्द्र आज़म द्वारा संपादित ग्रंथ - कुछ
गुलाब की, कुछ कपास की श्री आर.पी. शुक्ल के व्यक्तित्व एवं
कृतित्व को समर्पित है। |
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प्रशासनिक |
1972 बैच के आई. ए. एस. अधिकारी । मऊ, अंबेदकर
नगर, कानपुर देहात, झांसी व एटा जिलों में जिलाधिकारी रहे।
उ.प्र. के गृह सचिव रहे। संस्कृति, व पंचायती राज
विभागों में निदेशक रहे। आवश्यक वस्तु निगम के प्रबंध
निदेशक के अतिरिक्त परिवहन आयुक्त का भी पदभार संभाला ।
फैज़ाबाद मंडल के आयुक्त के बाद आप सहारनपुर मंडल
के आयुक्त रहे हैं व ३१ अगस्त को सेवा निवृत्त होने
जा रहे हैं। सहारनपुर वासी आपके द्वारा सहारनपुर के लाभार्थ किये
गये अनेकानेक विकास कार्यों के लिये आपका आभार व्यक्त करते हैं व आपके
सुखद जीवन की प्रभु से मंगल कामना करते हैं। |
श्री आर. पी. शुक्ल के
रचना संसार की एक झलक
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पांव के निशां
यूं तो हर पांव
अपने निशां छोड़ता है
पर, हर निशां
स्थाई और अनुकरणीय नहीं होता
क्या कभी तुमने मुड़ कर देखा है
कि तुमने
अपने पांवों के निशां
कहां छोड़े थे?
मिट्टी के ढेर, या
रेत की कगार में ?
यदि थे रेत पर
तो हवा ने मिटा दिये होंगे
यदि थे मिट्टी पर
तो बौछार से धुल गये होंगे।
वह देखो मेरे पैरों के निशान
सदियों बाद आज भी चट्टानों पर अंकित
हैं
ऐसे निशां मात्र चलने से नहीं
चलने की शैली से बनते हैं
और जिस दिन
तुम्हें चलने की शैली आ जायेगी
मेरे दोस्त!
तुम मुझ से ईर्ष्या नहीं करोगे।
तलाश
ऊपर सूरज की तपिश
नीचे बालू की जलन
बीच में झुलसता ये शरीर
भागता हूं
तो कोई दिशा नहीं मिलती
कोई डगर, कोई बस्ती
कोई मकां नहीं दिखता
परछाईं भी साथ नहीं देती।
कभी नज़दीक सिमट
छिपकली सी चिपट जाती है
कभी मरुथल के अजगर सी
लील जाने को दौड़ती है।
भाग नहीं पाता
थका शरीर
टूटता सपना
हताश हो
सोते बच्चे का सर सहलाता हूं।
डर भी लगता है मात्र इस अहसास से
कि कहीं विरासत में
दे न बैठूं अपनी तक़दीर उसको
खुली आंखों से हर रोज़ जो देखता हूं
बंद पलकों में वही सब सहता हूं।
अब न जाग पाता हूं,
न नींद आती है
हे ईश्वर
तुमने मुझे
कहां और क्या बना कर भेजा है
जहां सपनों में भी
कोई सुख नहीं मिलता। |
शक्ति पूजा
तुम्हारे उगते ही
दौड़ पड़ते हैं लोग
तुम्हारे नमन को।
सबको डर है
तुम्हारे तेज, तुम्हारी शक्ति का
पर कुछ ऐसे भी हैं
जो नमन कर जुट जाते हैं
तुम्हारी शक्ति के उपहास में।
सब कुछ देखते- सहते
जब तुम
लाली ओढ़े डूबते हो
क्रोध और विवशता की
तो उस वक्त
मेरे सिवा तुम्हारे पास कोई नहीं
होता
यहां।
उगते सूरज को
पूजने वाले सब हैं
पर डूबते सूरज को
जल चढ़ाने वाला कोई नहीं
मुझे पहचानो - मेरे शक्ति पुंज
हां, बस मैं ही हूं
तुम्हारा एक हितैषी।
मेरा भोलू
टूटे कुल्हड़ों पर
प्रलाप करते हो
मोती सरीखे - बेशकीमती
आंसू बहा डाले!
ये आंसू नहीं, मोती हैं
संजो कर रखो इन्हें ।
टूटना कुल्हड़ की नियति है
आज नहीं, कल टूटते
किन्तु तुम्हारी नियति आंसू बहाना
नहीं।
अब तक तुम
समाज को निहारते आये हो
आगे बढ़ो
अब समाज तुम्हारे पीछे चलेगा।
टूटे बर्तन जोड़े नहीं जाते
जुड़ते भी नहीं
जोड़ने की कोशिश में
जीवन गंवा दोगे
जुड़े भी तो क्षणभंगुर होंगे।
कुछ नया गढ़ो
कुछ नया रचो।
ऊपर अनन्त आकाश है
ऊंची उड़ान भरो
छोटे सपनों में
उलझ कर मत रह जाना।
चाक नहीं कुम्हार की तुम
कि घूमते ही रहो
उठाओ लोंदा माटी का
गढ़ डालो
एक नया संसार
सृष्टि नहीं, उत्कर्ष
अब तुम्हें तो
सृष्टा ही बनना होगा।
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"शुक्रिया सहारनपुर"
पैंतीस वर्ष पूर्व पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जनपद
से अपनी राजकीय सेवा आरंभ करने वाले श्री आर.पी. शुक्ल आगामी
३१ अगस्त २००९ को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जनपद में अपनी
राजकीय सेवा को विदा कहने से पूर्व इस जनपद के बारे में क्या - क्या
भावनायें रखते हैं, क्या अनुभव रहे उनके, किन-किन लोगों
ने, घटनाओं ने उनको प्रभावित किया - यही है शुक्रिया सहारनपुर
का कथानक।
मनोरंजक, आत्मकथात्मक शैली में लिखी इस पुस्तक में
सिर्फ कुछ घटनाओं, व्यक्तियों का ही वर्णन भर नहीं है अपितु यह श्रेष्ठ,
आदर-सम्मान के योग्य व्यक्ति, एक सहृदय कवि, चितेरे के जीवन-संघर्ष की
प्रेरणादायी गाथा है जिससे आप हर पल अनुप्राणित होते हैं, अभिभूत होते
हैं, सीखते हैं कि देखो, यदि इंसान चाहे तो अकेले भी बहुत कुछ कर सकता
है। श्री शुक्ल द्वारा मंडलायुक्त पद पर रहते हुए कराये गये
कार्यों का भी जिक्र इस पुस्तक में उन्होंने किया है, पुस्तक के बैक
कवर पर इस विकास कार्यों के चित्र भी सहेजे गये हैं किन्तु यह दास्तान
भी हमें ’सूचित’ कम और ’उत्साहित व प्रेरित’ ज्यादा करती है। इस
पुस्तक तक आते-आते संस्मरण लेखक के रूप में श्री शुक्ल स्वयं को भली
प्रकार स्थापित कर चुके हैं; अब उनकी लेखनी ठिठकती नहीं, बहकती
नहीं, एक सहज प्रवाह लिये चलती ही रहती है, इस तथ्य से भी
साक्षात्कार इस पुस्तक के माध्यम से भली प्रकार होता है।
सहारनपुर
वासियों को तो यह पुस्तक भायेगी ही, पर मुझे विश्वास है कि जिस किसी
व्यक्ति के भी हाथ में यह पुस्तक आयेगी, वह इसे आद्योपांत पढ़ना और फिर
गुनना अवश्य चाहेगा।
पुस्तक का नाम - शुक्रिया
सहारनपुर
प्रकाशक - सृजन प्रिंट्स, अंबाला रोड, सहारनपुर
मूल्य - रु० 125.oo (पेपर बैक) पृष्ठ संख्या - 140
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