रियाज़ हाशमी - उनके अपने शब्दों में

वो आदमी है आम सा
इक क़िस्सा ना तमाम सा
ना लहजा बेमिसाल है
ना बात में कमाल है
है देखने में आम सा
उदासियों की शाम सा
कि जैसे एक राज़ है
खुद से बे-नियाज़ है
ना महजबीं से रब्त है
ना शोहरतों का खब्त है
वो रांझा, ना क़ैस है

इन्शा, ना फैज़ है
वो पैकरे इखलास है
वफा, दुआ और आस है
वो शख्स खुदशनास है
तुम ही करो अब फैसला
वो आदमी है आम सा...!
या फिर बहुत ही खास है
ये आदमी 'रियाज़' है।

मुझे रियाज़ कहते हैं। दैनिक जागरण में चीफ सब एडीटर हूं और सहारनपुर ब्यूरो में इंचार्ज के तौर पर नियुक्त हूं।