कोई चश्मा चढा के देखे, चश्मा लगा के देखे कोई।
मैं अपनी मर्जी से जागी, अपनी मर्जी से ही सोई।
बीता कल सपना बन बैठा, आगे सफर बहुत ये चिंतन
कैसे तय इसको करना है, अभी से करती हूं ये मंथन।
सीमा मे मुझको रहना है, यदि असीम ऊंचाई छूना
सीमा का स्पर्श प्रथम पा, उत्साह मिलेगा मुझको दूना।
डाक्टर से डरती थी मैं भी, लेकिन वो तो मां सी देवी
इसीलिये तो सबसे पहले, उनके हाथों में आंखें खोली।
मां कहती है सत्कर्मो के, प्रसाद रूप प्रत्यक्षा आई
मैं सोचूं कि मैने तप से, मात पिता की ये निधि पाई।
घुट्टी पिला रही नानी मां, नाना वेद मंत्र कानो मे
मिले विवेक ख्याति जीवन में, श्रेष्ठ कार्य शक्ति प्राणों में।
नाना ने जिह्वा पर मेरी, सबसे पहले ओ३म् लिखा था
मीठा खूब लगा था लेकिन, इतना मुझको नहीं पता था।
मैं तो यहां आने से पहले, चार -2 देश नाच कर आई
मैने माता को बोला था, तुम बेफिक्र चलो तो माई।
सारे डटे कर्म पथ अपने, कोई कलकत्ता कोई दिल्ली
मुम्बई अलीगढी आयेंगे, तब बन जाऊंगी भीगी बिल्ली।
दादी संग वो वहां फंसे हैं, मैं उनके दर्शन को तरसूं
वो भी कम बेचैन नहीं हैं, इन सबके बिन कैसे हरषूं ?
जाने सुशान्त नाना हैं कैसे,
मैने अभी नहीं देखा है
उनकी तारीफें सुन सुन कर, जिज्ञासा की इक रेखा है।
ऐसे में क्या मजा जनम का, सारे बिजी विदाउट बिजनेस
सारा उखड पुखड कर डालूं, कहीं चल जाय अगर मेरा बस।
आओ फुर्सत के क्षण ले लो, बन जाओ मेरे संग बच्चे
संग खाओ खेलो तुतलाओ, होवो सरल सहज और सच्चे।
भले व्यस्त कितने भी होवें, दिव्य निधि सबको लायेंगे
बडे छुपे रूस्तम ये मामा, सबके मन को हरषायेंगे।
नानी मेरी कितनी अच्छी, नहीं वह निषि वासर देखे
मां हरदम उन पर झल्लाये, पर वो ख्याल सभी का रखे।
अब बस इंतजार है मुझको, दो मुझसे छोटे आयेंगे
इक हफ्ता आगे हूं चाहे, खुद को छोटा ही पायेंगे।
मूल्य समय का सब सीखेंगे, पल भर भी आगे सो आगे
इसी लिये जागें जीवन में, नहीं रहेंगे कभी अभागे।
सोचो कैसा मंजर होगा, जब हम तीन एक संग होंगे
कांय-कांय एक साथ करेंगे, मां पापा चारों तंग होंगे।
सब झटपट गोदी में ले कर, इधर उधर मन बहलायेगे
सोचो तो कैसा तब होगा, हर कमरे में हमको पायेंगे।
कोई लोरी गाता होगा, झल्ला कर डॉंट पिलाता कोई
उल जलूल करें सब हरकत, अरे इन्हें समझाओ कोई।
ये तो हमसे भी बच्चे बन, हमको आनंद दिलाते सारे
अपने बडे बडे ओहदे भी, इन सब ने हम पर हैं वारे।
कितनी बडी भाग्यशाली मैं, विश्वव्यापी परिवार मिला है
आश्रम के अग्रज साधक से, जी भर प्यार दुलार मिला है।
मैं भी उनसे गुर सीखूंगी, योग नियंत्रित सुर सीखूंगी
उनकी आशाओं पर चलकर, नन्हीं अद्भुत साधक दीखूंगी।
मैं तो दादा जी की सोचूं, मन मेरे संग और तन दिल्ली
बेचार मजबूर करें क्या, सभी उडाते उनकी खिल्ली।
अमृतसर वाली पडनानी, आयेगी बस ये पूछेगी
‘प्रत्यक्षा तू कीं खाना है‘, तब सबकी हांसी छूटेगी।
वो मुझको अपनी सी लगती, मुझ जैसी छोटी सी माई
हॅंसते हुये उन्हें मैं देखा, इक भी दांत नहीं है भाई।
नन्हीं सी नातिन को देखने की, उससे मिलने की, बातें करने की बहुत इच्छा
होते हुए भी अभी तक यह इच्छा फलीभूत नहीं हुई है। बैठे-बैठे यही
सोच रहा हूं -
जिसकी मां हो इतनी प्यारी,
वो प्रत्यक्षा कैसी होगी !
योग निपुण, चंचल चितवन, चपल दामिनी चमके जैसे
नृत्य कला में अद्भुत होगी, सीखेगी अपनी ही मां से ।
गौरा की अवतार लगेगी, जग में अमृत वर्षा होगी
जिसकी मां हो इतनी प्यारी, वो प्रत्यक्षा कैसी होगी !
आंगन में चहकेगी ऐसे, कोयलिया की कुह-कुह जैसे,
चन्द्रकला सी रोज बढ़ेगी, महंगाई की दर हो जैसे।
फिर वह दिन भी आ जायेगा, विद्यालय में दाखिल होगी,
जिसकी मां हो इतनी प्यारी, वो प्रत्यक्षा कैसी होगी !