डा. वीरेन्द्र ’आज़म’ : कलम का जुझारु सिपाही

 

स्तंभकार : द सहारनपुर डॉट कॉम

संवाददाता - आकाशवाणी व दूरदर्शन, दिल्ली एवं लखनऊ

2 C /755 पत्रकार लेन, प्रद्युम्न नगर, निकट जैन डिग्री कॉलिज,
मल्हीपुर रोड, सहारनपुर  फोन : 9412131404

डा. वीरेन्द्र ’आज़म’ ने अपना तीन दशक से अधिक का पत्रकारिता सफ़र जिन आदर्शों, मूल्यों और सिद्धान्तों के साथ किया, वे उन्हें पत्रकारिता के आदर्श शैलीकार, रिपोर्ताज़ के जनक डा. कन्हैयालाल मिश्र ’प्रभाकर’,  नवभारत टाइम्स के यशस्वी संपादक स्व. राजेन्द्र माथुर तथा कार्यकारी संपादक स्व. सुरेन्द्र प्रताप सिंह (एस.पी.) से मिले थे। वीरेन्द्र ’आज़म’ पत्रकारिता की इस त्रयी की परम्परा के ध्वजवाहक हैं।

वर्ष 1973 में कॉलेज की मैगज़ीन से लेखन की शुरुआत करने वाले वीरेन्द्र ’आज़म’ 1975 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और दैनिक हिन्दुस्तान, ट्रिब्यून, पंजाब केसरी, धर्मयुग, पराग, योजना व आउटलुक सहित विभिन्न समाचार पत्रों में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे हैं।  देश के सुप्रसिद्ध साहित्यकारों, राजनीतिज्ञों, वैज्ञानिकों एवं विभिन्न क्षेत्र के ख्यातिप्राप्त व्यक्तियों से आपके द्वारा किये गये साक्षात्कार प्रकाशित हुए हैं।  नवभारत टाइम्स, राष्ट्रीय सहारा, अमर उजाला, दैनिक जागरण, विश्वमानव आदि से संबद्ध रहते हुए 5000 से भी अधिक प्रमुख रिपोर्ट प्रकाशित हुई हैं। 

डा. वीरेन्द्र आज़म संपादक के रूप में भी बहुत सक्रिय हैं और शीतलवाणी, कृषि मंगल, संयम योगपत्रिका, शतपथ  पत्रिकायें तथा "कुछ गुलाब की, कुछ कपास की" ग्रंथ श्रेष्ठ संपादक के रूप में आपका परिचय कराने के लिये पर्याप्त हैं।  

डा. वीरेन्द्र आज़म को ’सहारनपुर की पत्रकारिता का राष्ट्रीय आंदोलन व जनजागरण में योगदान’  विषय पर शोध प्रबंध के लिये चौ. चरणसिंह विश्वविद्यालय से पी. एचडी. की उपाधि प्राप्त हुई है।

आपकी कवितायें भी विभिन्न मंचों पर सुनी जाती रही हैं व अनेकानेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।  कुछ समय से आप जापानी शैली की लघु कविता ’हाइकु’  लिखने आरंभ किये हैं।    सहारनपुर शहर को संबोधित वीरेन्द्र आज़म की एक कविता यहां प्रस्तुत है जो उनकी संवेदनशीलता व परिपक्व सोच का परिचय देती है। 

 

 यार शहर ! अब तू भी सोच ...

यार शहर ! अब तू भी सोच,
कुछ अपने बारे में।
आखिर कब तक सहेजेगा तू
हर दिन का ये सियासी दंगल,
झाड़ियों सा घना,
कंकरीट का जंगल ।
कब तक खामोश रहेगा तू,
लोगों की सीख पर,
अबलाओं की चीख पर।
उठ यार, आंखें खोल,
कुछ तो बोल।

देख, यहां हर कोई,
स्वार्थ की रोटी सेक रहा है,
दूसरे की तरफ नहीं,
सिर्फ अपनी तरफ देख रहा है ।
इसीलिये कहता हूं,
यार शहर ! अब तू भी सोच,
कुछ अपने बारे में ।

तू किस-किस की अभिलाषायें,
करेगा पूरी ?
यहां है,
सबके ’मुंह में राम, बगल में छुरी’।
तोड़ दे ये खामोशी,
इस दुनिया से कुछ तो सीख,
अपने दर्द पर कुछ तो चीख।
फिर कहता हूं, छोड़ दे ये हठधर्मी,
नहीं तो भीड़ में खो जायेगा,
कल तो तेरे आसपास का,
हर खेत शहर बन जायेगा।
इसीलिये कहता हूं,
यार शहर ! अब तू भी सोच,
कुछ अपने बारे में ।

तू नहीं जागा तो हम भी खो जायेंगे,
अपने अतीत को ढूंढते रह जायेंगे।
हम ढूंढते रह जायेंगे,
मक्का की रोटी और चने का साग,
हारी का दूध, और उपलों की आग।
खुशी की बिहाई और गांव का राग,
सेमल का फूल और जामुन का दाग़।
कुम्हार कहां से लायेगा,
खुदान की मिट्टी
डाकिया इस चौपाल बांचेगा,
चौधरी की चिठ्ठी?

कहां से लायेंगे,
जोहड़ का पानी, गोहर की धूल,
फागुनी मौसम में, टेसू के फूल ।
यार शहर ! अब तू भी सोच,
कुछ अपने बारे में ।

बचा सकता है तो बचा ले,
मयूर का नृत्य
सियार की हूक,
चिड़ियों की चीं - चीं,
और कोयल की कूक
भंवरे की गुंजन,
और फूलों का खिलना,
ओस की बूंदों का,
पत्तों से मिलना ।

पहले ही छूट चुका है
कुएं पर सखियों का बतियाना,
और रहट का गुनगुनाना ।
ताऊ का हुक्का और ताई की चिलम,
चौपालों पर आल्हा
और रागनी का ईलम ।
इसीलिये कहता हूं,
यार शहर ! अब तू भी सोच,
कुछ अपने बारे में ।

अब वक्त आ गया है खुद को झोंक,
कंकरीट की बाढ़ को बढ़ने से रोक।
सच कहता हूं,
तेरे जतन से हरियाली बच जायेगी,
बासंती मौसम में सरसों खिल जायेगी।
यार शहर ! अब तू भी सोच,
कुछ अपने बारे में ।