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Saharanpur's Legacy  - Historical Sites !

सहारनपुर के कुछ प्रतिष्ठित संस्थान IMPORTANT INSTITUTIONS OF SAHARANPUR

औद्यानिक प्रयोग एवं फल संरक्षण प्रशिक्षण केन्द्र - कंपनी बाग
(Horticulture & Food Preservation Training Centre - Company Bagh


सहारनपुर के कंपनी बाग की स्थापना ’फरहतबख्श’ यानि आनन्द देने वाला के नाम से सन्‌ १७५० ई. में इंतिजामुद्दौला द्वारा की गई बताई जाती है। बाद में इसकी हैसियत व महत्ता में अनेकानेक परिवर्तन होते रहे। ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकार में आ जाने के बाद इसे कंपनी बाग नाम मिल गया। डा. गोवान (जो सहारनपुर में उस दौरान सिविल सर्जन हुआ करते थे) और १८२३ में डा. रॉयल ने इसे संवारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह जानकर आश्चर्य होता है कि मसूरी का कंपनी बाग (लॉगी गार्डन) और चकरौता का नगऊ गार्डन का मुख्यालय सहारनपुर का यह कंपनी बाग ही था। तत्कालीन निदेशक डा. फॉकनर के आग्रह पर लॉर्ड आकलैंड ने इसे आर्थिक दृष्टि से मज़बूती प्रदान की और यह गार्डन समूचे ब्रिटिश साम्राज्य को औषधीय वनस्पति प्रदान करने वाला एकमात्र स्रोत बन गया। इनमें से प्रमुख थे - हेनबेन (Henben ), सिंकोना (Cinchona ), एकोनाइट (Aconite ), कोलोसिंथ (Colocynth ), जैलप, टेरेक्स्कम (ब्रह्मदंडी की एक किस्म), डिजिटॅलिस (Digitalis), कमेला, सनॉय, इपीक्यूआना (Ipicoc.), बेलाडोना (Belladona ), जटामानसी और चौबचीनी। इनमें से कुछ का उत्पादन मसूरी और चकरौता के उद्यानों में भी किया गया था। विश्व के अनेकानेक भागों से दुर्लभ वृक्षों की प्रजातियों को यहां लाकर लगाने का कार्य भी इस कालखंड में हुआ। अपने स्वर्णिम काल में यह कंपनी बाग बीज, पौधे, वृक्ष, जड़ी-बूटी प्रदाता के रूप में जाना जाता रहा और यहां पर शोध एवम्‌ प्रयोग की विशिष्ट सुविधायें जुटायी जाती रहीं। यहां के तत्कालीन निदेशक डा. जैमसन ने जब एक आकलन किया तो पता चला कि इस बाग की ५ मील की परिधि में इसकी सहायता से ७०० से अधिक बाग, १७१३६ फलदार वृक्ष, ५५१७९ अन्य वृक्ष, स्ट्रॉबेरी के पौधे, तथा अन्य किस्मों के ९५६६ पाउंड बीज निःशुल्क बांटे जा चुके थे और सफलतापूर्वक उग रहे थे। देहरादून के चाय-बागान भी इसी श्रृंखला का हिस्सा हैं।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात्‌ हमारी विभिन्न सरकारों की नासमझी, लालच और उदासीनता के चलते क्रमिक रूप से इस संस्थान का पराभव होता चला गया है और विश्व भर को दुर्लभ वनस्पति की खोज में सहायता देने वाला यह अनूठा संस्थान हमारे कुछ राजनेताओं की तो आंख की किरकिरी तक बन चुका है। कुछ ही वर्ष पूर्व प्रदेश सरकार की ओर से एक दुष्प्रयास किया गया कि इस बाग की परिधि पर बाउंड्री वॉल को हटा कर तीस-तीस फुट गहरी दुकानें बना कर बेची जायें। इसका सीधा सा अर्थ था कि तीस फुट की सीमा में आने वाले सभी पेड़ काट कर फेंक दिये जायें, दुकानें बनाने के लिये कंपनी बाग की नींव खोद दी जाये, बाग के भीतर ईंट, बजरी, रेत, सीमेंट, लोहे से भरे ट्रक दिन-रात आने आरंभ हो जायें। दुकानों को बना देने के बाद उनके पिछवाड़े कंपनी बाग की ओर खोल कर वहां पार्किंग स्थल, जन-सुविधाओं आदि की भी व्यवस्था के नाम पर और जगह घेर ली जाये। डीज़ल और मिट्टी के तेल से चलने वाले जनरेटर सैट भी दुकानों के पिछवाड़े रखवा दिये जायें। दुकानों के निर्माण व आबंटन में धन कमाने की नीयत से यह षड्यंत्र संपूर्ण उत्तर प्रदेश में रचा गया परन्तु जागरुक जनता, पर्यावरण प्रेमियों व न्यायपालिका से सक्रिय हस्तक्षेप से इस सरकारी आदेश को निरस्त करा दिया गया।

कंपनी बाग की हत्या होने से तो फिलहाल बच गयी तथापि, कल्पनाहीनता का पूर्ण परिचय देते हुए इस संस्थान का उपयोग विवाह, मेलों आदि समारोहों के आयोजन हेतु किराये पर देने के लिये आज भी किया जा रहा है। ऐसे आयोजनों के संपन्न हो जाने के अगले दिन सुंदर लॉन के स्थान पर बची-खुची दाल-सब्ज़ियों के ढेर, पॉलीथिन, थर्मोकोल के गिलास, चम्मच, प्लेट, पॉलिएस्टर के खाली रैपर, जूठन में मुंह मारते आवारा जानवर, सड़ चुके भोजन की असह्य दुर्गन्ध न तो इस कंपनी बाग के संरक्षक नियुक्त किये गये उद्यान निदेशकों की आत्मा को कचोटती प्रतीत होती है और न ही प्रातः - सायं भ्रमण हेतु जाने वाली जनता ही इस बारे में चिंतित लगती है।

आज स्थिति यह है कि कंपनी बाग में काफी सारा स्थान घेर कर वॉकिंग प्लाज़ा बना दिया गया है, प्रकाश की व्यवस्था कर दी गई है। सॉस और जॅम कैसे बना कर कैसे संरक्षित किया जाये, इसकी कक्षायें यदा-कदा चलाई जा रही हैं, कई वर्ष के अंतराल के बाद इस बार मार्च में फल, पुष्प एवं शाक-भाजी प्रदर्शनी का एक रोता-धोता सा आयोजन हुआ जिसमें कंपनी बाग का अपना योगदान नगण्य ही प्रतीत हो रहा था। कुछ वर्ष पूर्व तक ऐसे आयोजन में कंपनी बाग की सार्थक सहभागिता हुआ करती थी व यहां विकसित की गई फलों, पुष्पों, बीजों की किस्मों का गौरवशाली प्रदर्शन हुआ करता था। यह वही कंपनी बाग है जहां से पपीते से पपेन निकालने की विधि का विकास एवं उसका मानकीकरण हुआ और उसका अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट लिया गया। आम की नई प्रजातियां - गौरव, सौरभ, नीलम आदि यहां विकसित की गईं। लौकाट की प्रजाति ’सहारनपुर स्पेशल’, आड़ू की प्रजाति - ’सहारनपुर प्रभात’ यहीं विकसित हुई थी। आज इसे जॉगर्स पार्क का, बैंक्वेट हॉल का स्वरूप दिया जा रहा है। मिट्टी में फैल रहे विष के फलस्वरूप पेड़ खोखले हो-हो कर गिर रहे हैं। और हमारे जन-प्रतिनिधि हैं कि इसे भी अपनी उपलब्धि समझ कर इठला रहे हैं, अपने नाम के पत्थर लगा कर स्वयं को अमर हो गया मान बैठे हैं।

इस कंपनी बाग को आज प्रतीक्षा है एक ऐसे त्राता की जो इसकी महत्ता और वर्तमान पीड़ा को समझ सके, इस पर काबिज़ हो गये नितांत संवेदना विहीन, कल्पना-विहीन अधिकारियों से इसे निज़ात दिला सके और इस ’फरहतबख्श’ कंपनी बाग को इसका पुराना गौरव और प्रतिष्ठा वापिस दिला सके। क्या कोई इसकी वेदना सुन पा रहा है?


केन्द्रीय लुगदी एवं कागज़ शोध संस्थान (लघु नाम - सीपरी)
(Central Pulp & Paper Research Institute - nicknamed as CPPRI)

(भारत सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत औद्योगिक नीति एवं प्रोत्साहन विभाग के अन्तर्गत एक स्वायत्तशासी राष्ट्रीय स्तर का शीर्ष  संस्थान)

स्थापना वर्ष : 1980   

उद्देश्य :  लुगदी एवं कागज़ के निर्माण की विधि में उत्तरोत्तर गुणवत्ता हासिल करने के लिये उपयोग-परक शोध करते रहना। 
कार्यरत कर्मचारी एवं अधिकारी : 115
सालाना बजट :  रु० 4.00 करोड़ वार्षिक
प्रांगण :   स्टार पेपर मिल्ज़, सहारनपुर के सामने,  49 हेक्टेयर में विस्तारित भूखण्ड पर एक प्रशासनिक इकाई एवं दो प्रयोगशाला इकाइयां  (One Administrative block and two laboratory blocks in 49 hectere of well-secured land).    69 आवासीय भवन व अतिथि भवन भी इस संस्थान में हैं।

 

संस्थान में उच्च-कोटि के पल्प एवं पेपर तकनीक के क्षेत्र के वैज्ञानिकों की नियुक्ति की गई है जिनसे एकमात्र अपेक्षा यह है कि वह देश की पेपर मिलों में वर्तमान में प्रयोग की जा रही लुगदी व कागज़  निर्माण तकनीक  में सुधार हेतु निम्न सूत्रों पर कार्य करते रहें -

  •      उत्पादन में आने वाले खर्च में निरंतर कमी आये।

  •      कागज़ एवं कागज़ से बनने वाले विभिन्न उत्पादों की क्वालिटी में निरंतर सुधार आये।

  •      कागज़ निर्माण के दौरान खर्च होने वाली विद्युत ऊर्जा,  पानी व विभिन्न रसायनों का उपयोग कम से कमतर हो।

  •      लुगदी एवं कागज़ निर्माण की प्रक्रिया में पर्यावरण को क्षति कम के कमतर हो।

उपलब्धियां -  पिछले 29 वर्षों की कार्य अवधि में इस संस्थान द्वारा 15 तकनीकें ईजाद की गई हैं जिनमें केवल 2 का व्यावहारिक उपयोग अभी तक हुआ है।  संस्थान की इस  उपलब्धि को आप किस प्रकार आंकते हैं,   क्या यह आपको संतोषजनक प्रतीत होती है ?   क्या आपके पास इस बारे में कुछ ठोस  एवं रचनात्मक सुझाव हैं?     कृपया हमें विद्वतापूर्ण विचारों से सभी पाठकों को अवश्य अवगत करायें । हमारा पता आप जानते ही हैं -  info@thesaharanpur.com    हमें आपके पत्रों की प्रतीक्षा रहेगी।    

 

संपर्क सूत्र - निदेशक, सीपरी

                   पो. बा. 174, पेपर मिल रोड,

                   हिम्मत नगर, सहारनपुर-247001 उ. प्र.

                   फोन - 0132-729398;  727227

वेबसाइट का पता - www.cppri.org.

director@cppri.org

 

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