What's New?
  Water of Paondhoi river has the intrinsic properties of mineral water : Scientific Report : Attempts to rescue 300 year old river are on at full swing. Sankalpuri, the place of origin of Paondhoi is being critically examined to improve flow of water into the river.

  Saharanpur experiences acute SUMMER CAMP fever. Everyone is busy learning / teaching dance these days. Scores of dance workshops going on in the city.

  सहारनपुर के प्रख्यात कवि सुरेश ’सपन’ द्वारा रचित रामकथा का स्वामी अवधेशानन्द जी द्वारा लोकार्पण किया गया। 29 मई को स्वामी रामतीर्थ केन्द्र में आयोजित कार्यक्रम में विभिन्न वक्ताओं ने दोहा शैली में रचित इस काव्य रचना की भूरि भूरि प्रशंसा की।

  जल चेतन समाज - संस्कार निधि द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस पर ५ जून को संगोष्ठी का आयोजन किया जायेगा। स्थान - ज्ञानकलश इंटरनेशनल स्कूल, अंबाला रोड, सहारनपुर

  Students of Saharanpur prove their metal, coming out with flying colours in various exames.

  Ghad area of Saharanpur suffers from acute water shortage while in Saharanpur town, people are seen throwing tap-water on streets to stay cool !

  किसी नेता / अफसर ने मंडलायुक्त कार्यालय के सामने 70वें दिन भी धरने पर बैठे गन्ना किसानों की सुध नहीं ली ।

  जल-प्रबंधन की तैयारियों को कमर कसी : बढ़ते तापमान से चिंतित मंडलायुक्त ने व्यवस्थाओं का जायज़ा लिया

  प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों को दो पालियों में देना होगा एक्ज़ाम : शासन से मिली हरी झंडी, बेसिक शिक्षा विभाग परीक्षा की तैयारियों में जुटा|








सहारनपुर : ऐतिहासिक सन्दर्भ

सहारनपुर : कब से - कहां - कैसे ?

 किसी व्यक्ति या समाज के मन में यदि स्वयं को जानने-समझने की इच्छा है तो अपने इतिहास को जानना किसी रहस्य व रोमांच से भरपूर फिल्म को देखने जैसा ही रोचक हो सकता है। सुना है,  जिन अंग्रेज़ों ने ब्रिटिश काल में हिंदुस्तान में रहते हुए भारतीय युवतियों से विवाह किया और देश स्वतंत्र हो जाने के बाद इंग्लैंड वापिस चले गये, उनके वंशज अपनी दादी, नानी, पड़नानी का बेहतर परिचय पाने के लिये सात समुंदर पार भारत आ जाते हैं, यहां की गलियों, मुहल्लों में अपने पूर्वजों के पदचिह्न तलाशना उनके लिये थका देने वाला, किन्तु अत्यन्त रोमांचकारी अनुभव बन जाता है। इसमे अस्वाभाविक कुछ भी नहीं।

            मैं इतिहास का विद्यार्थी कभी नहीं रहा। जब स्कूल के दिनों में इतिहास पढ़ना पड़ता था तो मेरा भी उससे नफरत जैसा सा ही कुछ रिश्ता बनता था। अतः सहारनपुर का इतिहास लिख सकूं, न तो मुझमे इतनी क्षमता है और न ही इतना ज्ञान मुझे है।  जब इस पृष्ठ के निर्माण का अवसर उपस्थित हुआ तो मेरे पास सहारनपुर के इतिहास की जानकारी प्राप्त करने का सर्वश्रेष्ठ स्रोत वही था जो बाकी सब के पास है अर्थात - "सहारनपुर संदर्भ" । इसके अतिरिक्त कुछ सामग्री विभिन्न वेबसाईट्स पर भी मिली पर उन सब का आधार भी मुझे श्री के.के. शर्मा द्वारा रचित "सहारनपुर संदर्भ" ही अनुभव हुआ। इस कालजयी रचना को व उसके विद्वान रचयिता श्री के.के. शर्मा को मैं सादर प्रणाम करना चाहता हूं।

सहारनपुर नाम कैसे मिला ?

इतिहासकारों व खनन से प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर यह स्पष्ट हो चुका है कि सिंधु घाटी की सभ्यता का विस्तार सहारनपुर तक भी था। सहारनपुर का नाम भी बदलता रहा है और इतिहासकार इस बारे में एक मत नहीं हो पाये हैं कि सहारनपुर को इसका वर्तमान नाम कैसे मिला। जनश्रुति के अनुसार एक सूफी संत शाह हारून चिश्ती के नाम पर यह क्षेत्र सहारनपुर के नाम से जाना जाने लगा था। सन्‌ 1340 में पांवधोई नदी के तट पर शाह हारून चिश्ती नाम के प्रसिद्ध सूफी संत के होने की सूचना मुहम्मद तुग़लक को मिली थी और बताया जाता है कि तुग़लक ने संत से मिलने के बाद फरमान जारी कर दिया था कि यह स्थान शाह हारूनपुर के रूप में जाना जाये। इसके विपरीत, कुछ इतिहासकारों की मान्यता है कि सहारनपुर को इसका ये नाम राजा साहरनवीर सिंह के नाम से मिला जिन्होंने अकबर के आदेश पर यहां चारदीवारी और चार दरवाज़ों से घिरी एक नगरी बसाई। पांवधोई नदी के तट के किनारे - किनारे नक्खासा, रानी बाज़ार, शाह बेहलोल और लक्खी गेट इस नगर के अंग थे और सराय गेट, माली गेट, बूड़िया गेट तथा लक्खी गेट - ये चार दरवाज़े थे।  इनके अवशेष आज भी उपलब्ध हैं। 

राजा साह रनवीर सिंह का किला खण्डहर के रूप में आज भी सहारनपुर के चौधरियान मुहल्ले में देखा जा सकता है। जितनी पतली, सुन्दर और इकसार ईंटों का इस किले में प्रयोग हुआ है, वह आज कल के ईंट भट्टे वालों को शर्मिन्दा करने के लिये पर्याप्त है। जिस - जिस भवन में भी इन पतली ईंटों का उपयोग हुआ है, वह सब एक विशेष कालखण्ड में बनी हुई सहज ही मानी जा सकती हैं। (पिछले तीस वर्षों में सहारनपुर में रहते हुए भी इन पुराने भवनों व खंडहरों के प्रति जो आकर्षण अनुभव नहीं हुआ था, वह आज इस वेबसाइट के लिये सहारनपुर का इतिहास उलटते-पुलटते हुए अनुभव होने लगा है।)

मित्रों,  जो बातें प्राचीन ग्रंथों में बताई जा चुकी हैं और जिन्हें अन्य वेबसाइट्स पर भी बार-बार दोहराया जा चुका है, उन्हीं को इस पृष्ठ पर दोहरा देना बहुत सरल तो है पर मुझे यह निष्प्रयोजन लगता है। वेबसाइट के फार्मेट को व आपकी रुचि को ध्यान में रखते हुए, क्या ये ज्यादा रोचक नहीं होगा  कि अपना कैमरा और नोटबुक लेकर सहारनपुर की गलियों, मुहल्लों, मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघरों, गुरुद्वारों में घूमूं, लोगों से बात करूं, पुराने चित्र मिल सकें तो वह भी स्कैन कर के इन पृष्ठों में लगाऊं?  जो जानकारी मुझे लोगों से बातचीत करके मिले, वह आप सब तक पहुंचाऊं?  

मेरे विचार से यह सब कुछ इतिहास लेखन की परिभाषा में नहीं आयेगा पर मैं यह पहले ही कह चुका हूं कि मैं इतिहास का विद्यार्थी हूं ही नहीं ! यह तो कुछ कुछ ऐसी ही चेष्टा है, जैसे कोई व्यक्ति अपने पुरखों के बाते में जानने की कोशिश कर रहा हो। इस राह पर चल कर मैं सौ-दो सौ साल से पीछे जा पाऊंगा ऐसी मुझे कोई आशा नहीं, पर जितनी भी जानकारी मिलेगी वह मजेदार तो होगी ही।
 

सहारनपुर कितना पुराना है?

सहारनपुर का परिचय  समय - समय पर अनेकानेक विद्वानों द्वारा दिया जाता रहा है।  सहारनपुर के शाकुम्भरी तीर्थ का प्राचीनतम उल्लेख   आचार्य विष्णुगुप्त ( चाणक्य )  द्वारा लगभग 2500 वर्ष पूर्व  किया गया बताया जाता है।  सहारनपुर के बहादराबाद, अंबाखेड़ी, बड़गांव, हुलास, नसीरपुर आदि क्षेत्रों में पुरातात्विक सर्वेक्षणों के आधार पर भी सहारनपुर (तत्कालीन उशीनर)  को सिंधु घाटी की सभ्यता से जोड़ा गया है। सन्‌ 1803 ई. में सहारनपुर अंग्रेज़ी राज्य केA page from Saharanpur Gazetteer अधिकार में आ गया था।  इंपीरियल गज़ेटियर ऑफ इंडिया,  1909 (Imperial Gazetteer of India, 1909)  में सहारनपुर का विशद परिचय दिया गया है और इसे सहारनपुर के बारे में आधिकारिक ग्रंथ माना जाता है।  एक सर्वकालिक महत्व का ग्रंथ "सहारनपुर संदर्भ"  के रूप में सितंबर 1986 से हम सब के उपयोग हेतु घर-घर में मौजूद है।  इस अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रंथ को हम सब तक लाने का श्रेय प्रसिद्ध इतिहासकार श्रद्धेय श्री के.के. शर्मा को है जिन्होंने 1979  से आरंभ किये अपने इस भागीरथ प्रयास को सितंबर, 1986 में सफलतापूर्वक संपन्न किया।  सहारनपुर के भौगोलिक सन्दर्भ और प्रागैतिहासिक संस्कृतियों से आरंभ करते हुए विद्वान इतिहासकार श्री के. के. शर्मा ने अपने - अपने विषय के लब्धप्रतिष्ठ विद्वानों से लेख आमंत्रित करते हुए सहारनपुर के जन-जीवन के लगभग प्रत्येक पक्ष का विस्तृत परिचय दिया है।  आज 2009 में सूचना प्रौद्योगिकी के युग में, डिजिटल तकनीक से लैस होकर हम इस महान रचना में केवल यह कमी निकाल सकते हैं कि इसका अगला संस्करण  1986 से लेकर आज तक नहींSaharanpur Ref. Manual  - Editor Sh. K.K. Sharma निकाला जा सका अतः इन 23 वर्षों की अवधि की कोई जानकारी इसमें शामिल नहीं है और यह भी कि इस ग्रंथ में चित्रों का घोर अभाव है।  पर घोर धनाभाव से जूझते हुए 554 पृष्ठों का ग्रंथ 1986 के कालखण्ड में प्रकाशित किया जा सका - यह स्वयं में एक चमत्कार से कम नहीं है।  उस जमाने में जानकारियों के आदान प्रदान के लिये इंटरनेट और वेबसाइट (internet / websites) जैसी सुविधायें कहां थीं?

 

 

 

 सहारनपुर की स्थापना और राजा साहरन वीर सिंह

 सहारनपुर का तराना           
 

 

 
 


 

 
   
   
 

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