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सहारनपुर में घड़ियाँ, चप्पल व पान का बाज़ार
नक्खासा बाज़ार घंटाघर से जो बाज़ार भगत सिंह मार्किट के नाम से आरंभ होता है, वही आगे नेहरू मार्किट कहलाने लगता है। जब नेहरू मार्किट भी समाप्त हो जाता है तो सड़क दो बाज़ारों में विभक्त हो जाती है -दायें हाथ की ओर जाने वाला बाज़ार शहीदगंज कहलाता है और बायें वाला नक्खासा बाजार । नक्खासा बाज़ार में पान, सुपारी इत्यादि की आढ़त है, घड़ीसाज़ों व साइकिल वालों की अनगिनत दुकानें हैं और इसके अलावा न जाने किन - किन गलियों के मुहाने हैं। यहां कुछ दुकानें काश्मीरी रफूगरों की भी हैं व कुछ दुकानों पर लखनवी चिकन की कढ़ाई वाले कुर्ते, कमीज़, पाजामे, साड़ियां व लेडीज़ सूट मैटीरियल मिलता है। नक्कासा का शाब्दिक अर्थ नर्तकी से है। बताया जाता है कि मुगल काल में यहां नर्तकियों के आवास थे। अब यह व्यस्त बाज़ार है। नक्कासाओं के वंशज आदि यहां रहते हैं अथवा नहीं, जानने का अभी तक मैने कोई प्रयास नहीं किया है। परन्तु भवन निर्माण शैली - विशेषकर प्रथम तल पर छज्जे पुराने समय की पहचान आज भी हैं। सोच रहा हूं कि पता किया जाये कि इन आवासीय भवनों में आजकल कौन रहते हैं। इस बाज़ार का जिक्र राजा साहरनवीर सिंह द्वारा बसाई गई सहारनपुर की चार बस्तियों में के एक के नाते आता है। |
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