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सहारनपुर में किरयाना बाज़ार
बाज़ार मोरगंज (Moreganj)
मोरगंज बाज़ार किरयाना, दाल, चावल, घी, तेअल, गुड़, मिर्च, मसालों आदि का
थोक व खुदरा बाज़ार है। यहां कुछ दुकानें जड़ी-बूटियों की भी हैं जिनकी
आपूर्ति का स्रोत हिमालय के जंगल बताये जाते हैं। वैद्य और
हकीमों की लिखी दुर्लभ दवाओं, असली व शुद्ध जड़ी-बूटियों को खोजते हुए
लोग अक्सर इसी बाज़ार में आते हैं। गोविन्द अत्तार की दुकान
तो सुना है, चौथी पीढ़ी में चल रही है। इस दुकान पर यूनानी,
आयुर्वेदिक व दादी अम्मा की बताई हुई घरेलू दवायें मिलती हैं।
इस बाज़ार में इतना अधिक अतिक्रमण किया हुआ है कि दिन
में यहां कोई भी वाहन लाने की सोचना भी गुस्ताख़ी ही कही जायेगी।
हर दुकान के आगे सामान लादने वाले रिक्शा, हाथ-ठेली खड़े मिलते हैं ऐसे
में किसी दुकान में घुसने के लिये भी जगह बनानी पड़ती है।
लाल मिर्च की धसक के कारण मैने कई बार इस बाज़ार से अपने
घर तक छींकते हुए ही रास्ता पार किया है। हफ्ते भर के लिये नाक
बिल्कुल साफ हो जाती है। इसी से लगे हुए बूरा बाज़ार, बाज़ार कक्कड़गंज
पंसारी बाज़ार, लोहा बाज़ार आदि हैं। बूरा बाज़ार में जिस प्रकार की
खांड की बूरा और बताशे मिल सकते हैं, वह सुना है कि बड़े- बड़े शहरों
में नहीं मिलते हैं। मुंबई में रहने वाली मेरी बहिन भी बूरा यहीं
से खरीदती हैं। पता नहीं, मुंबई में ऐसा बूरा मिलता नहीं या
उन्होंने वहां ढूंढने की जहमत नहीं उठाई। उनका कहना ये है कि वहां
बूरा के नाम पर पिसी हुई चीनी दे दी जाती है पर उसमें वह स्वाद नहीं हो
सकता जो खांड की बूरा में होता है। अतः जिन लोगों को चावल पर घी-बूरा
डाल कर चटखारे ले ले कर खाने की आदत है, उनको तो बूरा बाज़ार तक आना ही
होगा भले ही यहां कितनी भी मधुमक्खियां क्यों न हों।
मोरगंज बाज़ार का इतिहास उलटें-पुलटें तो पता चलता है कि
अंग्रेज़ों के जमाने में एक कैप्टेन मोर हुआ करते थे जिनके नाम पर इस
बाज़ार को यह मोरगंज नाम मिला ।
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