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सहारनपुर में साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थायें
Indian People's Theatre Association (IPTA)
सहारनपुर इप्टा की स्थापना उस समय हुई जब 1951 में इप्टा के पुनर्गठन के लिये मुम्बई में वृहत्तर सांस्कृतिक आंदोलन के लिये सभी ’प्रगतिशील ताकतों’ को इकठ्ठा करने का फैसला उस समय हुई बैठक में लिया गया। 1952 में सहारनपुर में ’इप्टा’ की स्थापना के लिये मुख्य रूप से श्री कौसर तसनीमी, स्व. मसरूर खां सरोहा, एवं श्री एस. पी. नैब का नाम उल्लेखनीय है। इप्टा एक आंदोलन, एक विरासत है जिसने कला की हर विधा पर अपनी छाप छोड़ी। स्व. मुंशी प्रेमचन्द की कहानियों का नाट्य रूपांतर करके अनेकानेक प्रस्तुतियां उन दिनों दी जाती रहीं। आगरा, मेरठ, लखनऊ, इलाहाबाद और जगाधरी इप्टा से भी सहारनपुर इप्टा का सम्पर्क व समागम बना रहा है। लगभग २३ वर्षों के बिखराव के बाद सहारनपुर इप्टा को पुनः सक्रिय करने का बीड़ा उठाया श्री संजय गर्ग व अशोक चौधरी ने। श्री त्रिपुरारी शर्मा के साथ मिल कर नाट्य प्रशिक्षण शिविर आयोजित किये गये और मज़दूरों के खिलाफ बनाये गये विधेयक के विरोध में एक नुक्कड़ नाटक के शहर व सहारनपुर के गांवों में २०-२५ मंचन किये गये। यह इप्टा का अति-सक्रियता का काल रहा जिस दौरान अनेकानेक रंगकर्मी इप्टा से जुड़े, अनेक प्रशिक्षण शिविर आयोजित होते रहे व नाटकों के अनेकानेक मंचन हुए। इप्टा का आज तक का इतिहास बिखराव और पुनर्स्थापना, पुनर्गठन का इतिहास है। वी.के. डोभाल, सरदार अनवर, चांद दुर्रानी, सुबोध लाल आदि - आदि अनेकानेक रंगकर्मी इप्टा का परचम समय समय पर बुलंद करते रहे हैं।
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