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सहारनपुर : कब से - कहां - कैसे ?
किसी व्यक्ति या समाज के मन में यदि स्वयं को
जानने-समझने की इच्छा है तो अपने इतिहास को जानना किसी रहस्य व रोमांच
से भरपूर फिल्म को देखने जैसा ही रोचक हो सकता है। सुना है, जिन
अंग्रेज़ों ने ब्रिटिश काल में हिंदुस्तान में रहते हुए भारतीय युवतियों
से विवाह किया और देश स्वतंत्र हो जाने के बाद इंग्लैंड वापिस चले गये,
उनके वंशज अपनी दादी, नानी, पड़नानी का बेहतर परिचय पाने के लिये सात
समुंदर पार भारत आ जाते हैं, यहां की गलियों, मुहल्लों में अपने पूर्वजों
के पदचिह्न तलाशना उनके लिये थका देने वाला, किन्तु अत्यन्त रोमांचकारी
अनुभव बन जाता है। इसमे अस्वाभाविक कुछ भी नहीं। सहारनपुर नाम कैसे मिला ?
इतिहासकारों व खनन से प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर यह
स्पष्ट हो चुका है कि सिंधु घाटी की सभ्यता का विस्तार सहारनपुर तक भी
था। सहारनपुर का नाम भी बदलता रहा है और इतिहासकार इस बारे में एक मत
नहीं हो पाये हैं कि सहारनपुर को इसका वर्तमान नाम कैसे मिला। जनश्रुति
के अनुसार एक सूफी संत शाह हारून चिश्ती के नाम पर यह क्षेत्र सहारनपुर
के नाम से जाना जाने लगा था। सन् 1340 में
पांवधोई नदी के तट पर शाह हारून चिश्ती नाम के प्रसिद्ध सूफी संत के
होने की सूचना मुहम्मद तुग़लक को मिली थी और बताया जाता है कि तुग़लक ने
संत से मिलने के बाद फरमान जारी कर दिया था कि यह स्थान शाह हारूनपुर के
रूप में जाना जाये। इसके विपरीत, कुछ इतिहासकारों की मान्यता है कि सहारनपुर
को इसका राजा साह रनवीर सिंह का किला खण्डहर के रूप में आज भी सहारनपुर के चौधरियान मुहल्ले में देखा जा सकता है। जितनी पतली, सुन्दर और इकसार ईंटों का इस किले में प्रयोग हुआ है, वह आज कल के ईंट भट्टे वालों को शर्मिन्दा करने के लिये पर्याप्त है। जिस - जिस भवन में भी इन पतली ईंटों का उपयोग हुआ है, वह सब एक विशेष कालखण्ड में बनी हुई सहज ही मानी जा सकती हैं। (पिछले तीस वर्षों में सहारनपुर में रहते हुए भी इन पुराने भवनों व खंडहरों के प्रति जो आकर्षण अनुभव नहीं हुआ था, वह आज इस वेबसाइट के लिये सहारनपुर का इतिहास उलटते-पुलटते हुए अनुभव होने लगा है।)
मेरे विचार से यह सब कुछ इतिहास लेखन की परिभाषा में
नहीं आयेगा पर मैं यह पहले ही कह चुका हूं कि मैं इतिहास का विद्यार्थी
हूं ही नहीं ! यह तो कुछ कुछ ऐसी ही चेष्टा है, जैसे कोई व्यक्ति अपने
पुरखों के बाते में जानने की कोशिश कर रहा हो। इस राह पर चल कर मैं
सौ-दो सौ साल से पीछे जा पाऊंगा ऐसी मुझे कोई आशा नहीं, पर जितनी भी
जानकारी मिलेगी वह मजेदार तो होगी ही। सहारनपुर कितना पुराना है?
सहारनपुर का परिचय समय - समय
पर अनेकानेक विद्वानों द्वारा दिया जाता रहा है। सहारनपुर के
शाकुम्भरी तीर्थ का प्राचीनतम उल्लेख आचार्य विष्णुगुप्त (
चाणक्य ) द्वारा लगभग 2500 वर्ष पूर्व किया गया बताया जाता
है। सहारनपुर के बहादराबाद, अंबाखेड़ी, बड़गांव, हुलास, नसीरपुर आदि
क्षेत्रों में पुरातात्विक सर्वेक्षणों के आधार पर भी सहारनपुर (तत्कालीन
उशीनर) को सिंधु घाटी की सभ्यता से जोड़ा गया है। सन् 1803 ई.
में सहारनपुर अंग्रेज़ी राज्य के
अंग्रेज़ों के जमाने की कोतवाली। पांवधोई गंगा बाबा लालदास की देन मानी जाती है।
म्हाड़ी (नकुड़ रोड) पांवधोई गंगा में नहाते खेलते बच्चे
बागेश्वर मंदिर का निर्माणाधीन गुम्बद व यहीं पर अत्यन्त प्राचीन मकान
कंपनी बाग, सहारनपुर की प्रसिद्ध छतरी व गिलोय का वृक्ष जिस पर बच्चे झूलते रहते हैं।
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