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ग्लोबल वार्मिंग के विरुद्ध सहारनपुर ने शंखनाद किया ।
सहारनपुर (१० मार्च)
: नीदरलैंड की राजधानी एम्सटर्डम को अपनी कर्मस्थली बनाये हुए ब्रह्मनिष्ठ
जूनापीठाधिकारी श्री सोहमबाबा ने आज सहारनपुर में ग्लोबल वार्मिंग पर आयोजित एक
विचार गोष्ठी में युवाशक्ति का आह्वान किया कि उनके मिशन द्वारा ग्लोबल वार्मिंग के
विरुद्ध चलाये जा रहे अभियान से जुड़े। उन्होंने कहा कि धन बल, बुद्धिबल और तपोबल की
शक्ति के साथ जनबल जुड़ जायेगा तो कोई भी समस्या इतनी बड़ी नहीं हो सकती कि उससे पार
न पाया जा सके। बाज़ारवाद से संचालित होने वाली पाश्चात्य उपभोक्तावादी संस्कृति ने हमें "यूज़ एंड थ्रो" का आदर्श दिया है जिसका सीधा सा अर्थ है कि अधिकतम उत्पादन हो और अधिकतम उपभोग हो। प्रगति को मापने का पैमाना यह हो गया है कि उपभोग को मापा जाये। अर्थव्यवस्था की प्रगति को सामाजिक प्रगति के समानार्थी मानने वाले इस एकांगी दर्शन व आदर्श के चलते, हमारी वर्तमान पीढ़ी सब कुछ खुद ही निबटा कर जाने की फिराक़ में है, भावी पीढ़ी के लिये कुछ बचेगा या नहीं, इसकी चिंता वर्तमान पीढ़ी को है ऐसा कहीं नहीं लगता। आज हम मिनरल वाटर की बोतल साथ में लिये घूमने लगे हैं, आगामी पीढ़ी ऑक्सीजन मास्क लेकर चलने को विवश होगी और हम हैं कि अपनी आर्थिक प्रगति को देखकर अघाते नहीं फिरते । ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्यायें सामने आ रही हैं, विश्व भर में मौजूद फैक्टरियां और वाहन न केवल धरती के तापमान में निरंतर वृद्धि कर रहे हैं अपितु कार्बन उत्सर्जित करते हुए अम्लीय वर्षा जैसे खतरे भी पैदा कर रहे हैं; भूजल स्तर निरंतर कम होता जा रहा है, वायु प्रदूषित होती चली जा रही है और हम में से कुछ लोग विभिन्न समस्याओं पर सेमिनार का आयोजन करके अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं। जबकि आवश्यकता यह है कि इस बारे में युद्ध स्तर पर प्रयास तुरंत आरंभ हों, जनता को आने वाले खतरे की भयावहता का आभास कराया जाये और विनाश की जिस राह पर हम बढ़े चले जा रहे हैं उससे बचने हेतु विकल्प गंभीरतापूर्वक तलाशा जाये। हम समझते हैं कि आज की यह विचार गोष्ठी इस दिशा में एक ठोस शुरुआत है। द सहारनपुर डॉट कॉम का स्पष्ट मत है कि ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से निबटने के लिये त्रि-आयामी रणनीति बनानी होगी। सबसे पहले हमें "यूज़ एंड थ्रो" संस्कृति से छुटकारा पाना होगा। यह कार्य सबसे कठिन है क्योंकि बड़ी - बड़ी अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनियां ऐसा कभी नहीं चाहेंगी। ये कंपनियां (और इनके पैसों से चलने वाली सरकारें) इस मामले में कुछ नहीं करेंगी - हां, चिंतित होने का नाटक अवश्य करती रहेंगी। गांधी जी ने कहा था कि प्रकृति के पास हमारी जरूरतों के लायक सब कुछ है, पर हमारे लालच को संतुष्ट करने लायक संसाधन प्रकृति के पास नहीं हैं। अधिकतम उपभोग नहीं बल्कि न्यूनतम उपभोग की संस्कृति हमें अपनानी होगी ताकि आने वाली पीढ़ी के लिये भी कुछ प्राकृतिक संसाधन बचे रह सकें। द सहारनपुर डॉट कॉम की दृष्टि में समस्या के समाधान का दूसरा आयाम हमारे वैज्ञानिकों पर निर्भर है। अभी हमारी मशीनें (वाहन व फैक्टरियों में लगे संयंत्र आदि) पैट्रोलियम आदि ईंधन की अत्यधिक खपत कर रही हैं जबकि, हमें ऐसा इंधन व मशीनें चाहियें जो मितव्ययिता का बिल्कुल नया व क्रांतिकारी आदर्श लेकर चलें। उदाहरण के लिये, हमें ऐसे वाहन चाहियें जो एक लीटर पैट्रोल/डीज़ल से (या अन्य किसी इंधन से) १००० या १०००० किमी चल सकें, पूरे शहर की विद्युत आपूर्ति आणविक इंधन की अत्यन्त सूक्ष्म मात्रा से की जा सकनी संभव हो। हमारी सब मशीनों में मेकेनिकल पार्ट्स के स्थान पर इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स लगाये जा सकें तो ईंधन की आवश्यकता स्वयंमेव ही नगण्य रह जायेगी। कुछ वर्ष पहले तक घड़ियों में मेकेनिकल पार्ट्स होते थे, आज नहीं होते अतः आज एक बटन सैल हमारी घड़ी को एक वर्ष से भी अधिक हेतु पर्याप्त ऊर्जा प्रदान करता रहता है, यही आदर्श स्थिति वाहनों व अन्य मशीनों के लिये भी सामने रख कर विश्व भर के वैज्ञानिक समुदाय को आविष्कार करने होंगे। सभी देश कुछ समय के लिये तोप, मशीनगन और रॉकेट बनाना बन्द कर यदि इस दिशा में वैज्ञानिक प्रयास करेंगे तो मानवता का निश्चित ही भला कर सकेंगे। समाधान का तीसरा आयाम यह है कि हमें अपने आसपास वनस्पति की मात्रा बढ़ानी होगी और प्राकृतिक संसाधनों के शोषण को रोकना होगा। क्षुधापूर्ति के लिये गाय का दूध दुहना ’दोहन’ है और गाय को मार कर उससे मांस से क्षुधापूर्ति करना संसाधनों का ’शोषण’ है, इसी प्रकार पेड़ से फल प्राप्त करना ’दोहन’ है पर पेड़ को ही काट देना ’शोषण’ है। हम अंधाधुंध पेड़ काट रहे हैं और हरियाली समाप्त करते हुए कंक्रीट के नये जंगल खड़े करते चले जा रहे हैं। ट्यूबवैल और सबमर्सिबिल लगाकर धरती में से पानी निरंतर उलीच रहे हैं पर उसके रिचार्ज को लेकर कोई चिंता नहीं कर रहे हैं। द सहारनपुर डॉट कॉम का यह भी सुनिश्चित मत है कि विश्व का प्रत्येक नागरिक ग्लोबल वार्मिंग व इस जैसी अन्य सभी समस्याओं के निदान के लिये अपने - अपने स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर सकता है। हमारी सामाजिक - सांस्कृतिक - शैक्षिक संस्थायें भी जन-जागरण का कार्य हाथ में लें, वाहनों के अनावश्यक उपयोग से बचने के लिये अपने सभी सदस्य परिवारों को प्रेरित करें, उपभोक्ता वस्तुओं के बारे में "इस्तेमाल करो व फेंको" ("यूज़ एंड थ्रो") संस्कृति के खतरों को समझें व इसके विरुद्ध खड़े हों तो हम सब अनेकानेक स्तर पर अपना ही भला करेंगे। अधिकतम वृक्षारोपण करें, अपने घर की छत पर ही सही, किचन गार्डन अवश्य विकसित करें। घर से बाज़ार/स्कूल जाने के लिये साइकिल को अपनायें; ऑफिस जाने के लिये एक कार में एक के बजाय चार-पांच सवारी बैठें; पानी को बरबाद होने से बचायें और प्लास्टिक व पॉलीथिन के उपयोग से बचें तो हमारे ये छोटे- छोटे प्रयास कुल मिला कर बहुत बड़ा परिवर्तन ला सकेंगे। द सहारनपुर डॉट कॉम वैब पोर्टल इसी दिशा में अपनी प्रतिबद्धता की घोषणा करता है। |
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