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जब-जब बाजे
बांसुरी, रहे न मुझको ध्यान ।
गोपी हूं या बांसुरी, या मुरली की तान ॥
पंछी उड़ते पंख
से, मैं उड़ती बिन पंख ।
जब मैं पी के संग हूं, मेरे पंख असंख ॥
प्रेम ख़रीदे
प्रेम को, प्रेम प्रेम का मोल ।
दोनों पलड़े प्रेम रख, प्रेम प्रेम से तोल ॥
एक पहर ठहरी
सखी, कान्हा जी के ठौर ।
पहुंची कोई और थी, लौटी कोई और ॥
एक बताशा मैं
भई, पिया रूप का ताल ।
डूब-डूब पी-ताल में, घुल-घुल हुई निहाल ॥
कुछ क्षणिकायें
मेरी
सांसों की किताब में
तुम लिखे हुए हो
मेरे हिसाब में ।
लो, हाथ
तुम्हारा पकड़ा
ख़त्म हुआ हर झगड़ा ।
तुम्हारा हूं
इसीलिये
अब तक
नहीं हारा हूं।
मैं कहीं हूं
वो कहीं है
फ़ासला तो है
दोनों के बीच
मगर ’दूरी’ नहीं है।
सात जनम की
यही कहानी
मैं मछली
वो पानी ।
तुम जिस तरह
मेरे हो
बस, तुम्हीं उस तरह
मेरे हो। |
इससे बढ़ कर सुख
कहीं, पूरे जग में नांहि।
इक वंशी बन में बजे, इक बाजे मन मांहि॥
ऐसे अंग लगाय
लो, सब अंतर मिट जाय ।
पिया कौन से कौन मैं, कोई बूझ न पाय ॥
भरे भवन में राधिका, पी में गई समाय ।
जैसे ख़ुशबू बिन दिखे, ख़ुशबू में मिल जाय॥
कंठ लगा पी ने कहा, कुछ तो प्यारी मांग।
सदा रहो तुम मांग में, यही हमारी मांग ॥
जिस माखन से आ रही, सुध बिसराती गंध ।
समझो जूठा कर गये, उसको छोटे नंद ॥
कुछ टप्पे
जग रोक न पाएगा
मीरा नाचेगी
जब प्रेम नचायेगा
वो इतना प्यारा है
चांद कहे उससे
तू चांद हमारा है
छम-छम-छम
बारिश है
माही, घर आ जा
हर बूंद सिफ़ारिश है
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