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मां शाकुम्भरी देवी शक्तिपीठ विश्व के विभिन्न भागों में रहने वाले आस्थावान् लोगों के लिये सहारनपुर का सीधा सा अर्थ है - मां शाकुम्भरी देवी का पावन शक्तिपीठ तीर्थस्थल ! मां शाकुम्भरी देवी के दरबार की चरण-रज माथे पर लगाने के लिये, अपनी अपूर्ण कामनाओं की पूर्ति के लिये प्रतिवर्ष लाखों लोग हज़ारों किमी की कष्टकर यात्रा तय करके भी सहारनपुर आते हैं। उनको सहारनपुर नगर के प्रति कोई आकर्षण हो यह कतई आवश्यक नहीं है। उनका तो बस एक ही लक्ष्य होता है - नगर से लगभग बयालीस किमी दूर शिवालिक की तलहटी में विद्यमान मां शाकुम्भरी देवी शक्तिपीठ तक पहुंचना। वर्षा ऋतु में दरबार तक पहुंचना किसी भी वाहन के लिये संभव नहीं रह जाता क्योंकि मार्ग में पड़ने वाली बरसाती नदी जब अपने रौद्र रूप में आ जाती है तो उसके तीव्र प्रवाह में बस या ट्रक को नियंत्रित करना भी सहज नहीं रहता, कार, स्कूटर और मोटर साइकिल की तो बिसात ही क्या है। पर यह नदी जितनी तेजी से चढ़ती है, उतनी ही तेजी से उतर भी जाती है। इस शक्तिपीठ की प्राचीनता को लेकर इतिहासकारों व पुरातत्वविदों में कोई एक सर्वमान्य मत नहीं है। पर इतना अवश्य है कि सर्वमनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली, कष्टों का हरण करने वाली इस देवी की मान्यता दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही चली जाती है। प्रतिवर्ष लाखों तीर्थयात्रियों की भीड़, हर समय चलते रहने वाले भंडारे, नवरात्रों में दर्शनार्थियों की मीलों लंबी पंक्तियां, इस दरबार को चढ़ावे के रूप में प्राप्त हो रही अकूत आय अपनी कहानी स्वयं बयान करने में सक्षम है। कैसे पहुंचें ?
हरियाणा - पंजाब या दिल्ली की ओर से
आ रहे दर्शनार्थियों के लिये सहारनपुर से होकर जाना सबसे सुगम है।
इसके लिये सहारनपुर से उत्तर की ओर सहारनपुर - विकासनगर - चकरौता
राष्ट्रीय राजमार्ग पर बेहट होकर जाना होता है जो सहारनपुर से पच्चीस
किमी की दूरी पर है। (बेहट सहारनपुर जिले की एक प्रमुख तहसील है)
। यहां से शाकुम्भरी देवी शक्तिपीठ के लिये रास्ता अलग हो
जाता है जो लगभग पन्द्रह किमी लम्बा है। अन्तिम एक किलोमीटर
की यात्रा नदी में से होकर की जाती है। यह नदी वर्ष में
अधिकांश समय सूखी रहती है। यदि आप अपने वाहन से सहारनपुर तक
पहुंचे हैं तो दरबार तक पहुंचना आपके लिये किसी भी प्रकार से कठिन नहीं
है। सहारनपुर - विकासनगर राष्ट्रीय राजमार्ग व्यस्त सड़क है अतः
विकासनगर की ओर जाने वाली या विकासनगर की ओर से आने वाली किसी भी बस
में आप बेहट तक तो बिना परेशानी के आ ही सकते हैं। नवरात्र के
दिनों में तो आपको सैंकड़ों - हज़ारों ग्रामीण बैलगाड़ियों में,
झोटा-बुग्गियों में, ट्रैक्टर ट्रॉलियों में या पैदल ही मां का गुणगान
करते हुए जाते मिल जायेंगे। सड़क पर लेट - लेट कर सहारनपुर से अनेक बसें विशेष रूप से मां शाकुम्भरी देवी दर्शन के निमित्त भी चलाई जाती हैं जो सहारनपुर में स्थित बेहट बस अड्डे से मिल जाती हैं। यदि आप पूरी टैक्सी करना चाहें तो प्राइवेट टैक्सी (इंडिका, टवेरा, इनोवा, सुमो आदि) भी सहारनपुर नगर में ही सरलता से उपलब्ध हो जाती हैं। देहरादून, ऋषिकेश, हरिद्वार की ओर से आने वालों के लिये बेहट पहुंचने के लिये सहारनपुर तक आना आवश्यक नहीं है। देहरादून - दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग पर छुटमलपुर के पास से कलसिया - बेहट को जाने के लिये अच्छी सड़क है। लगभग इक्कीस किमी लम्बी यह सड़क सहारनपुर - विकासनगर - चकरौता राजमार्ग को देहरादून - सहारनपुर - दिल्ली राजमार्ग से जोड़ती है। अतः देहरादून, रुड़की, हरिद्वार, ऋषिकेश की ओर से आने वाले तीर्थयात्री छुटमलपुर से देहरादून की ओर दो किमी पर खुल रही फतहपुर - कलसिया सड़क पकड़ कर बेहट पहुंच सकते हैं। यूं तो शिवालिक पर्वत श्रंखला पार करने के तुरंत बाद, विकासनगर - सहारनपुर मार्ग पर बादशाहीबाग से तथा देहरादून - सहारनपुर - दिल्ली राजमार्ग पर मोहण्ड से भी कच्चा रास्ता सीधे शाकुम्भरी मंदिर की ओर जाता है पर इस रास्ते पर पड़ने वाले जंगल में पूरी की पूरी बस भी लुट चुकी हैं अतः पुलिस कर्मी भी आपको यही सलाह देते हैं कि इस कच्चे रास्ते का प्रयोग करके हीरो बनने का प्रयास न करें। यदि कुछ अनहोनी घटती है तो वह जिम्मेदार नहीं होंगे।
बेहट - शाकुम्भरी मार्ग बाबा भूरा देव के मन्दिर पर पहुंच कर समाप्त हो जाता है। प्रचलित मान्यता है कि मां शाकुम्भरी देवी के दर्शन करने से पहले बाबा भूरा देव के दर्शन करने चाहियें। अतः सभी तीर्थयात्री यहां रुकते हैं, बाबा भूरादेव के दर्शन करते हैं, तरोताज़ा होकर बची हुई एक किमी की यात्रा पैदल या अपने वाहन से सम्पन्न करते हुए मां शाकुंभरी देवी के दरबार तक पहुंचते हैं।
मुख्य दरबार में स्थित प्रतिमायें शाकुम्भरी देवी मन्दिर में चार प्रतिमायें प्रतिष्ठित हैं - शाकुम्भरी देवी, उनके दाईं ओर भीमा देवी तथा भ्रामरी देवी तथा बाईं ओर शताक्षी देवी। दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय में इन देवियों का दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों के नाते परिचय मिलता है। प्रतिमायें चार भले ही हों, पर यह मन्दिर मूलतः मां शाकुम्भरी देवी का ही माना जाता है। (कई स्थानों पर आप शाकुम्भरी देवी के स्थान पर शाकम्भरी देवी भी लिखा हुआ देख सकते हैं।) |
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