कौन सा कैमरा खरीदें ?
- Sushant Singhal
फोटोग्राफी ( photography ) का शाब्दिक अर्थ है - प्रकाश का अंकन ( photo =
light, graphy = recording ) यदि प्रकाश नहीं है तो फोटोग्राफी भी नहीं हो सकती
। हां, कुछ वीडिओ कैमरे ( video camera ) ऐसे हैं जो पूर्ण अंधकार ( zero lux
shooting ) में भी चित्र लेते हैं पर वह प्रकाश के सहारे नहीं अपितु इंफ्रारैड
किरणों ( infra-red radiation ) के सहारे चित्रांकन करते हैं जिसके लिये कैमरे
पर दिया गया एक स्विच ( Night Shot or Super Night Shot ) सरका कर इस सुविधा को
एक्टिवेट ( activate ) करना होता है। ये फोटोग्राफ अच्छे तो नहीं होते पर किसी
रिश्वतखोर को स्टिंग ऑपरेशन (sting operation ) के द्वारा जेल भिजवाने के लिये
पर्याप्त हैं। खैर !
कैमरे के दो कार्य हैं - १) किसी दृश्य को व्यू फाइंडर पर दिखाना (showing a
scene on view finder) २) उस दृश्य को, यदि हम चाहें तो स्थाई रूप से किसी न
किसी मीडिया पर अंकित कर देना ( recording the scene on one or the other media
) पहले ये मीडिया फिल्म होती थी, पर धीरे धीरे डिजिटल मेमोरी कार्ड फिल्म का
स्थान लेते चले जा रहे हैं । वीडिओ कैमरा मैग्नेटिक टेप पर यह रेकार्डिंग करता
है। नवीनतम डिजिटल वीडिओ कैमरे मैमोरी चिप, डीवीडी या हार्ड डिस्क को मीडिया के
रूप में इस्तेमाल करने लगे हैं ।
कैमरा किसी दृश्य को अच्छी प्रकार से व्यू फाइंडर में दिखा पाये, यह मूलतः
कैमरे की लेंस की क्वालिटी ( quality of the camera lens) पर निर्भर करता है।
यदि एक ही कंपनी ने आज दो लेंस बनाये हैं - एक का बाहरी ग्लास का डायमीटर १
सेमी और दूसरे का २ इंच है तो बड़ा लेंस छोटे की तुलना में कई गुना ज्यादा
बारीकी से आपके दृश्य को अंकित कर पायेगा । इसे लेंस की रिज़ॉल्विंग पॉवर (
resolving power of the lens ) कहते हैं । कोई भी कंपनी कितनी भी प्रतिष्ठित
क्यों न हो, उसके मोबाइल फोन (mobile phone) में लगी हुई बेचारी नन्हीं सी लेंस
किसी भी बड़ी लेंस का मुकाबला नहीं कर सकती । जब लेंस की अपनी सीमा आ जाये तो
मेगा पिक्सल (megapixels) बढ़ाने से क्या हो जायेगा? वैसे मैने कुछ चित्र सोनी
एरिक्सन मोबाइल फोन (Sony Erricson mobile phone ) से खींचे हुए देखे हैं जिनको
देख कर सहजता से विश्वास नहीं होता कि ये मोबाइल फोन का रिज़ल्ट है।
यदि लेंस की क्वालिटी चेक करनी हो तो फोटो खींच कर उसे कम्प्यूटर के बड़े मॉनीटर
पर ज़ूम करके देखिये । यदि पलकें, सिर के (या दाढ़ी के) बाल अलग-अलग और स्पष्ट
दिखाई दे रहे हैं तो लेंस की रिज़ॉल्विंग पॉवर (resolving power) अच्छी है। यह
रिज़ॉल्विंग पॉवर जिन जिन बातों पर निर्भर करती है उनमे एक लेंस का डायमीटर भी
है। आप दुकान पर खड़े होकर और चीज़ें तो चैक नहीं कर सकते पर लेंस कितनी बड़ी है,
यह तो नंगी आंखों से भी दिखाई देता है।
अतः फार्मूला नंबर १ - जब कैमरा खरीदें तो मेगा पिक्सल कितने हैं इस पर कम और
लेंस कितने डायमीटर की है, इस पर अधिक ध्यान दें । लेंस का फ्रंट ग्लास एलिमेंट
(front glass element) का डाया ज्यादा है तो कम पिक्सल भी चलेंगे । (कम पिक्सल
का यहां अर्थ है - minimum पांच मेगा पिक्सल)। चूंकि आम जनता मेगा पिक्सल पर
जोर देने लगी है, इसलिये प्रतिस्पर्धा के चलते, कैमरा निर्माता कंपनियां
ग्राहकों को अधिकाधिक इम्प्रेस करने के लिये मेगापिक्सल बढ़ाये चली जा रही हैं ।
ऐसा करने से बिना निर्माण खर्च बढ़ाये कैमरे का मूल्य बढ़ाया जा सकता है !
एक प्रश्न जो मुझसे बार-बार पूछा जाता है वह है - "कैमरा कौन सा लें? Which
camera to buy? " कुछ साथियों ने
मेरे ब्लॉग पर भी कैमरा
न ले पाने का जिक्र किया है। इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले मेरे लिये कुछ
बातों का जानना आवश्यक होता है -
१- फोटोग्राफी की तकनीक समझने में कितनी रुचि है? How much do you wish to
learn about the photography technique? बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिनको न तो
फोटोग्राफी तकनीक के बारे में कुछ पता है और न ही जानने की इच्छा / धैर्य है ।
उनको तो ’देखो और बटन दबाओ’ (aim and shoot simplicity) कैमरा ही चाहिये। दूसरी
ओर कुछ लोग ऐसे हैं जो जिज्ञासु प्रवृत्ति के हैं । ऐसे लोग मोटर साईकिल भी
खरीदेंगे तो उसका मैनुअल जरूर पढ़ेंगे । "देखो और दबाओ" कैमरे दो प्रकार के हैं
- एक तो वो जिनको फिक्स्ड फोकस (fixed focus or box camera) या बॉक्स कैमरा कहा
जाता था। एक जमाना था कि आग्फा (Agfa) कंपनी के २००-३०० रुपये मूल्य के बॉक्स
कैमरे (Agfa Klik III, Agfa Isoly) जन्म दिन पर उपहार स्वरूप पाकर हृदय गदगद्
हो जाता था । लोग उन सीधे साधे कैमरों से भी इतनी अच्छी फोटो खींच लेते थे कि
अंतरराष्ट्रीय फोटोग्राफी प्रतियोगिता (International photography
competitions) में सांत्वना पुरस्कार (consolation prizes) तो ले ही आते थे। इन
कैमरों में शटर (shutter) दबाने के अलावा और कुछ कंट्रोल होता ही नहीं था। लेंस
भी कांच की न होकर प्लास्टिक की थी। ये कैमरे श्वेत-श्याम युग (black and white
photography) का प्रतिनिधित्व करते थे। आज इन कैमरों की महत्ता म्य़ुज़ियम में
सजाने तक ही है। डिजिटल क्रांति आने के बाद तक भी जो फिल्म वाले फिक्स्ड फोकस
बॉक्स कैमरे बहुत अच्छे (व सस्ते) माने जाते थे व मुझे सबसे अधिक प्रभावित करते
थे - वह थे - कोडक कंपनी का ’क्रोमा’ कैमरा (Kodak Kroma) और याशिका कंपनी क
’एम एफ २ सुपर’ कैमरा (Yashika MF 2 Super camera) ! १५०० रुपये से २००० रुपये
की कीमत में इनसे अच्छा कैमरा मेरी जानकारी में कोई नही है। इनकी लोकप्रियता कम
होने का कारण सिर्फ़ ये है कि आज डिजिटल युग में कोई सा भी फिल्म कैमरा लोकप्रिय
नहीं रह गया है। ये डिजिटल कैमरों के युग से पहले के बाशिंदे हैं ।
दूसरी ओर, "देखो और दबाओ" सुविधा हर प्रकार की नवीनतम तकनीक से सुसज्जित महंगे
डिजिटल कैमरे भी प्रदान करते हैं । आप कैमरे को ऑटो मोड (Auto mode) पर डाल दें
तो कैमरे के अंदर मौजूद इलेक्ट्रॉनिक सर्किट (Electronic Circuit) हर
अड्जस्ट्मैंट की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लेता है और आपको "देखो और दबाओ"
स्वतंत्रता (Aim and shoot simplicity) प्रदान कर देता है। हद ये है कि कुछ
नवीनतम मॉडल के कैमरों में तो चेहरा पहचानने (Face detection technology) व
मुस्कुराहट पहचानने (Smile Detection technology) की भी तमीज़ है । जब तक आप
बत्तीसी नहीं दिखायेंगे, कैमरा फोटो ही नहीं खींचेगा! (नेता लोग ऐसे ही कैमरों
से फोटो खिंचवाना पसंद करने लगे हैं ताकि सुबह अखवार में उनकी भुवन-मोहिनी
मुस्कान पाठकों का स्वागत करे! कोई मुआ पत्रकार मंच पर सोते हुए नेताजी की फोटो
अपने अखबार को न भेज दे! )। इस कैमरे को फोटोग्राफी में पारंगत किसी फोटो
कलाकार के हाथ में दे दीजिये तो वह सारे कंट्रोल ऑटो (auto) के बजाय मैनुअल
(manual) कर देगा और फिर कैमरे के कंट्रोल से ऐसे खेलेगा जैसे कोई पेंटर ब्रश
और रंगों से खेलता है। निश्चय ही ये कैमरे लगभग १०,००० रुपये के आस पास
मूल्यवर्ग से आरंभ होते हैं और इनका मूल्य कितना हो सकता है, इसकी कोई सीमा
नहीं है। लगभग सभी विख्यात कैमरा निर्माता कंपनियां ऐसे कैमरे लेकर बाज़ार में
मौज़ूद हैं । सोनी ( Sony ), कॅनन ( Canon ), निकॉन ( Nikon ) , ओलिंपस (
Olympus ), मिनोल्टा ( Minolta ), पेंटैक्स ( Pentax )आदि-आदि कंपनियों के
अनेकानेक मॉडल के कैमरे बाज़ार में उपलब्ध हैं। इनमे किसी भी कंपनी को दूसरी से
कमतर या बेहतर बताना अत्यंत कठिन है। मामला व्यक्तिगत पसंद, नापसंद का आ जाता
है । कोडक Kodak के बारे में जरूर कहूंगा कि उसके बनाये हुए Kodak Easy Share
डिजिटल कैमरे मुझे प्रभावित करने में पूर्णतः असमर्थ रहे हैं । अतः यदि आप मेरी
पसंद-नापसंद को कुछ अहमियत देना चाहते हैं तो डिजिटल कैमरों में कोडक छोड़ कर
कोई सी भी कंपनी का कैमरा चुन लें।
कुछ लोग मेगा पिक्सल MP or Mega Pixels को लेकर भी बहुत सोच - विचार में रहते
हैं। उनको लगता है कि जितने ज्यादा पिक्सल होंगे उतना ही कैमरा अच्छा होगा । पर
जब मैने वर्ष २००१ में पहला डिजिटल कैमरा खरीदा था तो वह ३.१ मेगा पिक्सल का
कैनन (Canon 3.1 megapixel camera) का कैमरा था । आज की तारीख में कोई ३.१ मेगा
पिक्सल के कैमरे को मोबाइल फोन में ही पसंद करे तो करे, कैमरे में तो शायद ही
कोई लेना चाहेगा । पर मैने अपने उस कैमरे से 30" x 40" आकार के प्रिंट सफलता
पूर्वक बनाये हैं। ६ मेगा पिक्सल से अधिक का कैमरा आप तब ही खरीदें जब आपकी जेब
में भरपूर हरियाली हो। छः मेगा पिक्सल का अच्छा कैमरा ( 6 megapixels camera)
जितने बड़े चित्र दे देगा उस आकार के चित्र आप शायद ही चार पांच से अधिक पूरे
जीवन में बनवायेंगे । अतः छः मेगा पिक्सल के बाद (और उससे पहले भी), पिक्सल पर
कम और लैंस की क्वालिटी (lens quality) पर अधिक ध्यान दें।
सुशान्त सिंहल